पुलिंडा के लोगों को दर्द भी सुनो सरकार

कोटद्वार। केदारधाम में आपदा के बाद हरकत में आई सरकार का ध्यान वहां गायब हो चुके गांवों तक राहत पहुंचाने पर गया तो है, लेकिन राज्य के कई गांव ऐसे हैं जहां के ग्रामीण वर्षों से हर रोज भूस्खलन की मार झेलते आ रहे हैं। ऐसा ही एक गांव में पुलिंडा। 40 वर्ष से इस गांव के लोग खिसकते पहाड़ के मलबे पर किसी तरह जिंदगी बसर कर रहे हैं। सरकारी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों के दर पर कई बार दस्तक देने के बावजूद इस गांव की सुध लेेने को कोई तैयार नजर नहीं आता। बरसात की रातों में आसमान में बिजली की हर कड़कड़ाहट उन्हें कहर बरपाती सी नजर आती है। सहमे और जागकर रात काटने वाले ग्रामीणों की आंखों में हर पल बस यही सवाल तैरता नजर आता है, ‘सरकार क्या यहां की सुध आपदा आने के बाद लोगे।

चौपाल सजने वाली जगहों में पड़ी खाई

कोटद्वार। पुलिंडा गांव में 40 वर्ष पूर्व 200 से अधिक परिवार रहते थे। वर्ष 1971 में यहां भूस्खलन का सिलसिला शुरू हुआ। तब बरसात में ग्रामीणों के कई खेत बह गए थे। सरकारी अनदेखी से तब भूस्खलन से बचने को कोई कदम नहीं उठाया गया। नतीजतन हर साल बारिश होते ही पहाड़ दरकता रहा। खेती तो तबाह र्हुई ही, कई घर जमींदोज हो गए। कभी जहां गांव की चौपाल सजती थी, अब कई सौ फीट गहरी खाई है। जिनके घर टूटे, वे गांव से निकलते गए और फिर लौटकर नहीं आए। कई आसपास के गांवों में बस गए। आज यहां महज 70 परिवार बाकी रह गए हैं। लेकिन कुदरत का प्रकोप अब भी लगातार जारी है। शनिवार को हुई बारिश के बाद यहां दो और मकानों में दरारें पड़ गई हैं।

सीएम का आश्वासन भी हवाई

कोटद्वार। पिछले साल ग्रामीणों ने विस्थापन की मांग को लेकर करीब दो महीने तक क्रमिक अनशन किया था। तब स्थानीय विधायक और स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी ने ग्रामीणों की मुलाकात मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा से कराई थी। सीएम के आश्वासन पर ग्रामीणों ने आंदोलन स्थगित तो किया, लेकिन यह भरोसा हवाई निकला।

मुख्य सचिव को भी दिलाई याद

इसी महीने शुरुआत में पुलिंडा विस्थापन समिति के अध्यक्ष केशर सिंह नेगी ने मुख्य सचिव सुभाष कुमार को पत्र भेज उन्हें उनके वादे की याद दिलाई थी। बता दें कि कुछ वर्ष पूर्व सुभाष कुमार ने गढ़वाल मंडल आयुक्त के रूप में तैनाती के दौरान प्रशासनिक अधिकारियों को गांव के विस्थापन की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करने को कहा था।

कोट–

दस साल में हम कई अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों के दरवाजों पर जा चुके हैं। गांव लगातार दरक रहा है। घरों में दरारें पड़ रही हैं। ग्रामीणों को जान-माल का खतरा बना हुआ है, लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है। रुद्रप्रयाग – केदारधाम की आपदा निसंदेह दुखद है, लेकिन यहां तो हम हर रोज मौत के मुहाने पर खड़े रहते हैं। सरकार आखिर कब ध्यान देगी।

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