
हमीरपुर। प्रदेश सरकार ने बजट प्रस्ताव में पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय में बढ़ोतरी की घोषणा की है। लेकिन पंचायत प्रतिनिधियों ने बढ़ोतरी को नकार दिया है। प्रतिनिधियों ने बढ़ोतरी को ऊंट के मुंह में जीरे के समान करार दिया तो किसी ने बढ़ोतरी को सरकार का चुनावी लॉलीपॉप करार दिया। प्रतिनिधियों ने कहा कि अच्छा होता सरकार मानदेय को बंद कर दे, कम से कम मजाक नहीं होगा।
पंचायत प्रधान संघ के वरिष्ठ उपप्रधान वीर सिंह रणौत का कहना है कि प्रधान के कार्यों को देखते हुए मानदेय कम है। अधिक बढ़ोतरी की जानी चाहिए थी। मानदेय में बढ़ोतरी केवल मात्र लॉलीपॉप है।
संयुक्त सचिव बलदेव सिंह का कहना है कि सरकार ने प्रधानों का मानदेय बढ़ाने के नाम पर टॉफी दी है। सरकार को कम से कम प्रधान के कार्यों को देखकर मानदेय तय करना चाहिए।
जिला परिषद अध्यक्ष सरला शर्मा का कहना है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में मानदेय को 3500 रुपये से बढ़ाकर 5000 रुपये किया था। वर्तमान में की गई बढ़ोतरी अनुपात में कम है तथा महंगाई को देखते हुए मानदेय में बढ़ोतरी होनी चाहिए थी।
बीडीसी सदस्य रणवीर का कहना है कि 200 रुपये की बढ़ोतरी केवल नाम के लिए है। बीडीसी सदस्यों ने 5 हजार रुपये का मानदेय प्रदान करने की मांग रखी थी। बीडीसी उपाध्यक्ष पुरुशोत्तम लाल का कहना है कि मानदेय में की गई बढ़ोतरी नाकाफी है।
जिला परिषद सदस्य सुशील सोनी का कहना है कि विधायकों के मुकाबले उनका मानदेय बहुत कम है। मानदेय की जगह सदस्यों को वेतन दिया जाना चाहिए था और पेंशन का भी प्रावधान किया जाना चाहिए।
जिला परिषद सदस्य अनिल शर्मा का कहना है कि एक विधायक को एक लाख रुपये से ऊपर वेतन मिल रहा है। एक जिला परिषद सदस्य करीब 14 पंचायतें देखता है। फिर भी उसे मनरेगा से भी कम दिहाड़ी मिल रही है। चार सौ रुपये बढ़ाने से अच्छा होता सरकार जिला परिषद सदस्य को दिया जाने वाला मानदेय बंद ही कर दे।
जिला परिषद सदस्य मदन धीमान का कहना है कि कम से कम 5000 रुपये मानदेय की मांग की थी। 400 रुपये की बढ़ोतरी तो ऊंट के मुंह में जीरे जैसी बात है। इतना एरिया घूमना होता है। दो हजार में कहां गुजारा होता है।
