न वेतन बढ़ाया, न नियमित किया

चंबा। बेशक सरकार ने आठ साल का सेवाकाल पूरा करने वाले कर्मचारियों को नियमित करने की नीति तय की है, लेकिन बाल आश्रमों में सेवाएं दे रहे करीब डेढ़ दर्जन कर्मचारियों को 17 साल से नियमित नहीं किया गया है। यही नहीं चतुर्थ श्रेणी के इन कर्मचारियों को मात्र 3500 रुपये मासिक मानदेय मिलता है। यह मजदूर की दिहाड़ी से भी कम है। ऐसे में उन्हें गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। प्रदेश में कुल 19 बाल व बालिका आश्रम चल रहे हैं। ये आश्रम हिमाचल प्रदेश बाल कल्याण परिषद की ओर से चलाए जा रहे हैं। वर्ष 1997 से 2006 तक इन आश्रमों में सेवाएं दे रहे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 1500 रुपये मानदेय मिलता था। वर्ष 2006 के बाद सरकार ने उनका मानदेय 3500 रुपये कर दिया। धर्मशाला, शिमला के ढली व चंबा के साहो स्थित बाल आश्रम के कुछ कर्मचारियों को हालांकि वर्ष 2006 का स्के ल दे दिया गया है, लेकिन तीसा के चिल्ली व मैहला स्थित बाल आश्रम के करीब 20 कर्मचारियों का न तो मानदेय बढ़ाया गया न ही उन्हें नियमित किया गया। कर्मचारी रविंद्र कुमार, दर्शना देवी, किशनी देवी, हरदेव, सुरेंद्र व अश्विनी ने बताया कि सरकार उनकी अनदेखी कर रही है। उन्होंने कहा कि पिछले 17 साल से न तो उन्हें नियमित किया गया और न ही उनका वेतन बढ़ाया गया। उन्होंने कहा कि इस संबंध में वे जून माह, 2013 में चंबा दौरे के दौरान मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से मिल चुके हैं। इसके अलावा परिषद के उच्चाधिकारियों को समस्या के बारे में अवगत करवा गया, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। उन्होंने सरकार से समस्या का समाधान करने की मांग की है। उन्होंने बताया कि 12 नवंबर, 2013 को कैबिनेट की बैठक में बाल कल्याण परिषद का बजट बढ़ाया गया है। इसके बाद कुछ एक कर्मचारियों का मानदेय भी बढ़ाया गया। इसमें मैहला व तीसा के कर्मचारियों की अनदेखी हुई है।

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