न रिक्शा, न घोड़ा, यहां तो बस पीठ का सहारा

अल्मोड़ा। गांवों और कस्बों में कई किमी दूर तक अस्पताल नहीं होने से मरीजों की जिंदगी दांव पर लगी रहती है। अगर भूले से कहीं अस्पताल है तो वहां डाक्टर और दवाइयां नहीं हैं। ग्रामीण मजबूरी में मरीज को लेकर अल्मोड़ा जिला मुख्यालय पहुंचते हैं लेकिन यहां पहुंचकर भी दुश्वारियां कम नहीं होती। मरीज को स्टेशन से अस्पताल तक पहुंचाने के लिए न रिक्शा होता और न घोड़ा। स्वास्थ्य विभाग अथवा अन्य संस्थाओं ने ऐसे मरीजों के लिए ह्वील चेयर तक की व्यवस्थानहीं की है। ऐसी स्थिति में गांव से आने वाले लोग आम तौर पर मरीज को पीठ में लादकर अस्पताल पहुंचाते हैं।
साधन संपन्न लोगों के लिए तो कोई दिक्कत नहीं है। सक्षम लोग मरीज को कार में बैठाकर कुछ ही घंटों के भीतर हल्द्वानी और अन्य स्थानों पर पहुंचा देते हैं लेकिन आम लोगों के लिए पहाड़ में काफी मुश्किलें हैं। तबियत बिगड़ने पर लोग मरीज को घोड़े और डोली में बैठाकर कई किमी दूर स्थित सड़क तक पहुंचाते हैं और किसी तरह मरीज को लेकर अल्मोड़ा पहुंचते हैं लेकिन स्टेशन में उतरने के बाद मरीज को अस्पताल तक पहुंचाने के कोई साधन उपलब्ध नहीं होते।
यहां न रिक्शा चलता है और न ही घोड़े की व्यवस्था है। हालत यह है कि दूर से आने वाले मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ह्वील चेयर भी उपलब्ध नहीं होती है। आखिरकार मरीज को पीठ पर लादकर अस्पताल पहुंचाने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। कई बार तो मरीज के साथ आई महिला को भी अपने बीमार परिजन को पीठ में लादना पड़ता है।

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