न्यू डिडसारी गांव तक भी पहुंचो सरकार

उत्तरकाशी। न्यू डिडसारी गांव पर प्रकृति का कहर इस तरह टूटा की जहां कभी गांव हुआ करता था, वहां गंगा की उफनाती जलधारा बह रही है। गांव में जो घर बचे हैं वह भी सूने पड़े हुए हैं। गांव के अनुसूचित जाति के 50 से अधिक परिवार दस दिनों से दो स्कूलों के छह कमरों में भेड़- बकरियों की तरह भूखे-प्यासे रह रहे हैं। गांव को जोड़ने वाला पुल बहने से इस गांव तक सिर्फ पटवारी ही पहाड़ी रास्तों से होकर पहुंच पाया। चार किलोमीटर यह रास्ता इतना विकट की थोडी सी लापरवाही मौत के मुंह में धकेल सकती है।
न्यू डिडसारी गांव में तबाही की सूचना पर में बुधवार सुबह उत्तरकाशी से मनेरी पहुंचा। यहां गांव को जोड़ने वाला पुल पूरी तरह से गंगा समाया हुआ है। बमुश्किल मनेरी डैम वाले रास्ते से गंगा को पार करते हुए पहाड़ी पगडंडियों से अकेले आगे बढ़ा तो दो किलोमीटर पर गांव के कुछ लोग हाथों में गैंती -फावड़े लिए मिले। पूछा भाई किस गांव से हो तो वह कहने उसी गांव से जो पूरी तरह से तबाह हो गया और अब दो स्कूलों में भेड़-बकरियों की तरह रह रहे हैं।
सरकार से कोई मदद नहीं मिली तो गांव का रास्ता खुद बना रहे हैं। इसके बाद मैं भी पैदल चलकर न्यू डिडसारी गांव पहुंचा। यहां रास्ते पर बैठी कुछ बुजुर्ग महिलाएं मिली, जो अपने उन पैतृक अशियानों को निहार रही थी, जिन्हें गंगा की जलधारा तबाह कर गई। गांव में जो भवन बचे हुए थे, वह पूरी तरह से सूने पड़े हुए थे। मैंने एक बुजुर्ग महिला से पूछा गांव वाले कहां हैं तो एक विधवा औरत बिंदा देवी बोली, बेटा सारा गांव स्कूल में रह रहा है। स्कूल में गया तो उम्र के साठ दशक पूरे कर चुकी गांव की कुछ बुढ़ी महिला फफक कर रोने लगी। अपनी व्यथा को सुनाते हुए उनकी आंखे पूरी तरह से आंसू से तर हो गई। कहने लगी हमारे पास न तो खाने के लिए और न ही रहने के लिए। अभी तक हमें सरकार से कोई मदद नहीं मिल पाई। कुछ देर व्यथा सुनने के बाद उनका रहन-सहन देखा तो दो स्कूलों के छह कमराें में 50 से अधिक परिवार रह रहे थे। एक ही चूल्हे पर 50 से अधिक लोगों का खाना बन रहा था। राशन सीमित होने पर बच्चों को पूरा भोजन नहीं मिला, तो वह चिल्ला रहे थे मुझे दो मुझे दो।
बहरहाल बाढ़ को दस दिन बीतने के बाद भी इस गांव में अभी तक पटवारी के अलावा कोई भी नहीं पहुंचा है। मंगलवार को ग्रामीणाें ने एक खेत पर हैलीपैड बनाया तो एक हैलीकाप्टर ने लैंड किया और गांव वालों को बिस्कुट और नमकीन बांटा, लेकिन इसके बाद ग्रामीणों आसमान में मंडराते हैलीकाप्टर को देख रहे हैं कि वह कब उतरेगा और हमारे लिए आटा-चावल लाएगा, लेकिन कोई उनकी सुनने वाला नहीं है।

इनके मकान समा चुके गंगा में

शांतिलाल, बृजलाल, रामलाल, राजेंद्र प्रसाद, अखिलेश, अशोक कुमार, गजेंद्र, कमल सिंह, केदार सिंह, नरेंद्र सिंह, अनिरुद्र, सरस्वती, राजेश सिंह, विनोद, रामचंद्र, बुद्धि लाल, दिनेश लाल, सुरेश, मुकेश, कमल सिंह बिष्ट।

इनके मकानों को है खतरा
हर्षपति, प्रतापलाल, विजयराम, कौंसा देवी, महिमानंद, संतोष, सुरेंद्र, महेंद्र, भरोसालाल, राकेश कुमार, गुलाबी देवी, सोहनलाल, दर्शनलाल, बचनलाल, मनोज कुमार, अनोज कुमार, अमरलाल, संजयलाल, रतनलाल, इंदुबाला, मदनलाल, जितेंद्र, बिंद्रा देवी, तुलसीदास, अहिल्या देवी।

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