
नई टिहरी। लगता है शासन-प्रशासन पिछली आपदाओं से सबक नहीं ले पाया है। जिस तरह से लगातार बारिश हो रही है, उससे खतरे की जद में आए जिले के 33 गांव के लोगाें की नींद उड़ गई है। आलम यह है, कि अब तक भूस्खलन के खतरे से जूझ रहे कई गांवों का भूगर्भीय सर्वेक्षण तक नहीं कराया गया है। पहले से चिह्नित गांवों के पुनर्वास को लेकर भी शासन मौन है।
वर्ष 2010-11 में हुई भारी बारिश से कई गांव भूस्खलन की चपेट में आ गए थे। अब बारिश ने जिस तरह कहर बरपाना शुरू किया है, उससे भूस्खलन की जद में आए 33 गांव के लोगाें जान-माल की सुरक्षा को लेकर खासे भयभीत हैं। लापरवाही यह है, कि पिछले तीन वर्षों में जिन गांवों के विस्थापन की संस्तुति की गई थी, उनमें से 10 गांवों को बसाने के लिए भी चयनित भूमि का सर्वेक्षण तक नहीं किया गया है। प्रभावितों को दो सौ वर्ग मीटर भूमि देकर उन्हें सुरक्षित स्थान पर भूमि आवंटन की कार्रवाई भी ठंडे बस्ते में है।
इन गांवों का होना है भूगर्भीय सर्वेक्षण-
सरमोली, तुंणगी मध्ये धर्मपुर, सौडू, जाखणी, घिल्डीयालगांव, मंजाकोट, त्यालनी मध्ये खलोड़ा, पनेथ, महेड़ा मय चंठुवा, दड़माली मध्ये दौड़का, बनाली मध्ये जिजली, जमोलना, रमोलगांव, डोडग-थापला, डांगी, कोटी, आगर, भैंसर्क, कांडारीगांव, डौंर, रमोलसारी और फर्त आदि।
पुनर्वास को चिह्नित भूमि का नहीं हुआ सर्वे-
मेड, मरवाड़ी, अगुंडा, पिंसवाड़, कोटी, बडियारकुंडा, ठेला, इंद्रोला, सुपाणा और बुड़कोट।
डौंर में जिंदा दफन हुए थे छह लोग
नरेंद्रनगर प्रखंड के डौंर गांव में वर्ष 2011 में बादल फटने से छह लोग जिंदा दफन हो गए थे। गांव अब भी खतरे के मुहाने पर खड़ा है। बावजूद सरकार ने दो वर्ष बाद भी गांव के विस्थापन को लेकर कोई कदम नहीं उठाया।
कोट-
भूस्खलन से प्रभावित गांवों की रिपोर्ट शासन को भेजी गई है। प्रशासन की पहली प्राथमिकता प्रभावितों को सुरक्षा मुहैया करवाना है। ताकि जनहानि से बचा जा सके। इसके लिए अधिकारियों को निर्देश देने के साथ मैं स्वयं भी नजर रख रहा हूं। -नितेश कुमार झा, जिलाधिकारी टिहरी।
