नदियों के किनारे बने हैं कई सरकारी भवन

कहा जाता है कि संकट के समय शुतुरमुर्ग अपनी गर्दन रेत में यह सोचकर छिपा लेता है कि वह इससे बच जाएगा, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।

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केदारघाटी में आई जलप्रलय के बाद सरकार ने यह फैसला तो कर लिया कि नदियों के किनारे भवनों का निर्माण नहीं करने दिया जाएगा लेकिन वह इस पर अमल कैसे करेगी? राजधानी में ही नदियों के किनारे न केवल बस्तियां बल्कि सरकारी भवन तक बन गए हैं। वह भी तब जबकि पहले से ही ऐसे निर्माणों को रोकने के लिए कानून है।

विधानसभा भवन रिस्पना के किनारे
जिस विधानसभा में कानून बनाए जाते हैं उसका भवन ही रिस्पना नदी की जद में है। बेशक सुरक्षा दीवार बनाकर रिस्पना नदी के बहाव को मोड़ दिया गया है लेकिन यदि रिस्पना कभी उफनाई और अपने स्वभाव के अनुकूल मूल बहाव की तरफ बहने लगी तो विधानसभा भवन पूरी तरह से उसके प्रवाह क्षेत्र में आ जाएगा।

उस समय क्या होगा इसकी तो केवल कल्पना ही की जा सकती है।

तीस हजार से अधिक सरकारी-निजी भवन जद में
राजधानी में 150 से अधिक मलिन बस्तियां और 30 हजार से अधिक सरकारी एवं निजी भवन नदियों के किनारे बना दिए गए हैं। ये ऐसे भवन हैं जो बारिश में बाढ़ की जद में आ जाते हैं।

जिला जेल परिसर, उत्तरांचल तकनीकी विश्व विद्यालय, दून विश्वविद्यालय, मत्स्य निदेशालय, भूतत्व एवं खनिज कर्म निदेशालय, राजस्व अभिलेखागार आदि के भवन नदियों के किनारे ही खड़े किए गए हैं। इसी तरह दर्जनों निजी संस्थानों की बिल्डिंग और इमारतें नदियों के किनारे उनके बहाव क्षेत्र में खड़ी हैं।

बेशक सुरक्षा दीवार बनाकर इन्हें नदी क्षेत्र से अलग कर दिया गया है लेकिन बारिश में यह कभी भी इसकी चपेट में आ सकते हैं। कई जगह तो पट्टे और सरकारी विद्यालय नदियों के बहाव क्षेत्र में बने हैं। इसका एक उदाहरण नंदा की चौकी के पास स्थित राजकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय कोल्हू खेत है जोकि टौंस की जद में बना दिया गया है।

नदियां हुई संकरी, तबाही की आशंका
सरकारी और निजी भवनों के निर्माण से शहर की नदियां संकरी हो गई हैं। कई तो नाले में तब्दील हो गई हैं। लेकिन बारिश में जब ये उफान पर होती हैं तो अपने पूरे क्षेत्र में बहती हैं। जानकार बताते हैं कि नदियां अपना प्रवाह बदलती रहती हैं। लेकिन वह कब मूल प्रवाह पर आ जाएं कहा नहीं जा सकता।

नदियों के प्रवाह बदलने पर लोग नदी क्षेत्र में काबिज हो जाते हैं मगर नदी को जब कुदरत से इतनी शक्ति मिल जाती है कि वह अपने मूल प्रवाह पर जा सके तो वह जाती है। इसके बाद तो भयंकर तबाही ही होती है। जैसा कि इस समय केदारघाटी में हुआ है।

इस मामले में सरकार के जैसे दिशा निर्देश प्राप्त होंगे उसी के अनुसार कार्य किया जाएगा।
– बीवीआरसी पुरुषोत्तम, जिलाधिकारी

नया प्रावधान
सरकार ने अपने नए प्रावधान में तय किया है कि बारिश के दौरान नदी का पानी जहां तक पहुंचता है वह डूब क्षेत्र में माना जाएगा। इस क्षेत्र तक किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक रहेगी। ऐसे निर्माण को अवैध माना जाएगा। लेकिन कई भवन और बस्तियां पहले से ही इस नियम के दायरे में आ रहे हैं।

कानून है पर अमल नहीं
पहले से ही कानून है कि गंगा नदी के तट के 200 मीटर तक कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता है। ऐसे किसी भी निर्माण को गैर कानूनी माना जाएगा। लेकिन ऋषिकेश से लेकर हरिद्वार तक गंगा के किनारे ऐसे कई भवन बन गए हैं जो 200 मीटर की परिधि के अंदर आते हैं।

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