
देवाल। चेपडियूं से नंदकेशरी की राह भी मुश्किल भरी है। थराली-देवाल मोटर मार्ग इस स्थान पर हादसों का सबब बना हुआ है, वहीं पैदल रास्ता भी चलने लायक नहीं है। मां नंदा के ससुराली क्षेत्र में प्रकृति के कहर से जनजीवन अभी भी अस्त-व्यस्त है। एक भी रास्ता ऐसा नहंी है, जिसे चलने लायक कहा जाए। कमिश्नर के दो दौरो से लेकर सीएम की वांण में हुई समीक्षा बैठक भी राजजात तैयारियों को धरातल पर अमलीजामा नहंी पहना पाई। ऐसे में इन बदली परिस्थितियों में यहां पर कैसे देवी भक्तों की व्यवस्था होगी, इसका जवाब न राजजात समिति के पास है और न यहां के जनप्रतिनिधियों के पास।
तैयारियों के नाम पर सिर्फ पानी की लाइन
नंदकेशरी में राजजात तैयारियों के नाम पर इन दिनों पेयजल लाइन का निर्माण किया जा रहा है। पार्किग, ट्रेक मार्ग सुधार, अवस्थापना विकास, सड़क से मंदिर तक सीसी मार्ग आदि का निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है। सुलभ शौचालय का काम भी अटका है। विकास विभाग ने 4.52 लाख की लागत से प्रतीक्षालय बनाया था, जो आपदा की भेंट चढ़ चुका है।
नंदकेशरी का धार्मिक महत्व
देवाल ब्लाक में समुद्रतल से 12 सौ मीटर की ऊंचाई पर स्थित नंदकेशरी पिंडर नदी के किनारे बसा है। यहां मां भगवती और भगवान शंकर के प्राचीन मंदिर के पास ही अठठ् भैरव का भी मंदिर है। नंदकेशरी के पौराणिक मंदिर में मां लक्ष्मी एवं नारायण भगवान की सुंदर मूर्तिया है, वहीं पार्वती की एक हाथ में शिवलिंग और दूसरे में माला लिए मूर्ति आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं।
राजजात में इनका होता मिलन-
नंदकेशरी में श्रीनंदा राजजात में अल्मोड़ा, कोट, भ्राभरी तथा नौटी से आने वाली मां श्रीनंदा की डोलियों सहित गढ़वाल-कुमाऊं की कई छंतोलियों का मिलन होता है।
इसलिए पड़ा नंदकेशरी नाम —
कहा जाता है कि एक बार नंदा देवी कैलाश जा रही थीं। तभी एक दैत्य नंदा का पीछा करने लगा। दैत्य से बचने के लिए नंदा सुरई के वृक्ष की ओट में छुप गईं, जहां उनके सिर के केश (बाल) वृक्ष की टहनियों में उलझ गए। माना जाता है कि मां नंदा के केश सुरई के पेड़ में उलझने से ही यहां का नाम नंदकेशरी पड़ा। यहां मंदिर में एक पौराणिक पंचवृक्ष भी है, जिसमें बड़, सुरई, पीपल, पैंया तथा बेडू के पेड़ एक साथ जुड़े हुए हैं। 1925 से मंदिर में वैदिक मंत्रोच्चार के साथ देवी की पूजा-अर्चना होती है।
इनका कहना है —
पिंडरघाटी में आपदा के कहर से जनजीवन अभी भी पटरी पर नहीं लौटा है। नंदकेशरी में भी स्थितियां अनुकूल नहीं है। ऐसे में राजजात के हिमालय क्षेत्र के रास्तों के बारे में स्वयं समझा जा सकता है। सरकार ने अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। राजजात समिति भी इससे अनजान नहीं है। इस बार मां नंदा की पूजा-अर्चना और राजजात परंपराओं के तहत ही की जाएगी।
