
अस्कोट (पिथौरागढ़)। सदियों पहले कैलास मानसरोवर यात्रा का संचालन साल में दो महीना 11 दिन ही होता था। पाल राजाओं के वंशजों के पास मौजूद वर्ष 1938 की यात्रा कारूट चार्ट तो यही बताता है।
अस्कोट रियासत के अंतिम राजा टिकेंद्र बहादुर पाल के सुपुत्र कुंवर भानुराज पाल के पास संरक्षित दस्तावेजों में वर्ष 1938 की मानसरोवर यात्रा का रूट चार्ट भी धरोहर के रूप में मौजूद है। वर्ष 1279 से वर्ष 1938 तक 659 साल कैलास मानसरोवर यात्रा का संचालन अस्कोट रियासत से होता था।कैलास मानसरोवर यात्रा कमीशन द्वारा जारी इस रूट चार्ट में यात्रा की अवधि 20 जून से अगस्त तक अंकित हैं। यानि कि दो माह 11 दिन यात्रा का संचालन होता था। शायद इसका कारण तब अत्यधिक बर्फबारी हो। क्योंकि तिब्बत प्रवेश पर तब कोई पाबंदी नहीं थी।
चार्ट में अल्मोड़ा से पैदल चलकर वापस अल्मोड़ा आने में कैलास यात्रियों को 36 दिन का समय लगने का उल्लेख हैं। वर्तमान में 22 दिनों में दिल्ली वापसी हो जाती है। 1938 के रूट चार्ट में अल्मोड़ा, जागेश्वर, धौलछीना, सेराघाट, गनाई, थल डीडीहाट, अस्कोट, जौलजीबी, बलुवाकोट, धारचूला, तपोवन, खेला, सोसा, जिप्ती, मालपा, गर्व्यांग, कालापानी, नाभीढांग, लिपुलेख, तकलाकोट, खुचरनाथ, तिरखापुरी, सालाछाकांग होते हुए तारचन पहुंचने और मानसरोवर और कैलास पर्वत की परिक्रमा का जिक्र है।
वापसी में न्यान्दी गोंपा, डीराफुक गोंपा, गौरीकुंड, जूनठुल गोंपा, तारचन होते हुए उसी रूट से थल तक आने फिर बागेश्वर में बागनाथ, गरुड़ के पास बैजनाथ भगवान के दर्शन करते हुए सोमेश्वर से अल्मोड़ा जाने का जिक्र है। 1938 के चार्ट में गुंजी के स्थान पर गर्व्यांग पड़ाव था। पुराणों में टनकपुर के रास्ते के मानसरोवर यात्रा का प्राचीन रूट नेपाल की ब्रह्मदेव मंडी, चंपावत, रामेश्वर, हाट कालिका, पाताल भुवनेश्वर, थल से दर्शाया है।
