
कोटद्वार। कोल्हूचौड़ में वनकर्मियों पर फायरिंग करने का मामला भले नया हो, लेकिन लैंसडौन वन प्रभाग की कोटड़ी रेंज में फंदा लगाने का मामला बावरिया गिरोह की सक्रियता की ओर इशारा कर रहा है। सूत्रों की मानें तो कुख्यात वन्यजीव तस्कर भीमा बावरिया गिरोह के सदस्यों का इस प्रकरण में हाथ हो सकता है।
भीमा को हरियाणा वन विभाग और पुलिस समेत कई एजेंसियों की संयुक्त टीम ने गुड़गांव से दबोचा था। उसके पास से तब बाघ की हड्डियां और खाल बरामद की गई थी। भीमा ने खुलासा किया था कि जिस बाघ की खाल उससे मिली थी, उसका शिकार भी उसने इसी रेंज से किया था। सूत्रों की मानें तो भीमा कार्बेट और उसके आसपास के क्षेत्र में चप्पे-चप्पे से परिचित है। उसका नेटवर्क इस कदर मजबूत है कि वन विभाग की किसी भी कार्रवाई से पहले ही उसे भनक लग जाती और वह छू-मंतर हो जाता था।
बाघ-हाथी की बहुतायत
एक वर्ष पूर्व कैमरा ट्रैपिंग की मदद से लैंसडौन वन प्रभाग के दुगड्डा और कोटड़ी रेंज में 16 बाघ देखे गए थे। यह उपलब्धि इस लिहाज से बड़ी थी कि इससे पहले यहां पांच से छह ही बाघ देखे गए थे। यानी यहां बाघों की संख्या बढ़ रही थी। यह क्षेत्र राजाजी पार्क से कार्बेट पार्क तक हाथियों के मुख्य कारिडोर में आता है। अनुमान के मुताबिक यहां सौ से अधिक हाथी मौजूद हैं। इनके अलावा लकड़बग्घा, फिश कैट, बारहसिंघे, चीतल आदि भी यहां बहुतायत में हैं।
पहले भी मारा था बाघ
भीमा वर्ष 2009 में भी बाघ की खाल संग पकड़ा गया था। तब भी उसने पूछताछ में कबूल किया था कि उस बाघ का शिकार इसी वन क्षेत्र में किया गया।
बड़े खुलासे की उम्मीद
सूत्रों की मानें तो वन विभाग की टीम भारी बारिश और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जंगल से निकलने की जल्दी में नहीं है। बताया जा रहा है कि पकड़े गए तस्कर को साथ लेकर वन टीम जंगल में चप्पा-चप्पा छान रही है। उसकी निशानदेही पर चार फंदे भी मिलने की बात सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि टीम के लौटने पर बड़ा खुलासा हो सकता है।
प्रमुख वन तस्कर
भीमा बावरिया, बल्कू बावरिया, तोताराम बावरिया, दरिया बावरिया, अली जान, गामी गुज्जर, रमेश कार्बेट टाइगर रिजर्व और तराई वन क्षेत्र में वन्यजीव तस्करी में लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। इन सभी के गुर्गे जंगलों में विभिन्न स्थानों पर रेकी कर वन्यजीवों के शिकार के लिए फंदा आदि लगाने का काम करते हैं।
वनों में तस्करों पर रोक लगाने के लिए सरकार में दृढ़ इच्छा शक्ति चाहिए। मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पास वन मंत्री का भी दायित्व है, लेकिन उन्होंने इस मसले पर आज तक कोई मीटिंग नहीं ली। यही हाल रहा तो कार्बेट से वन्यजीव समाप्ति के कगार पर पहुंच जाएंगे।
-अनिल बलूनी, पूर्व अध्यक्ष, वन एवं वन्यजीव संरक्षण सलाहकार परिषद
कुछ पुराने मामले
-वर्ष 2004 में लैंसडौन वन प्रभाग के मदाल्टी स्रोत के पास करीब दो सौ नए ब्लेड और कुछ बर्तन बरामद किए गए। मौके पर एक बड़े अजगर का कंकाल भी मिला था।
-वर्ष 2004 में 31 दिसंबर को कोटद्वार रेंज के ग्वालगढ़ बीट में टस्कर का शव मिला। टस्कर के दोनों दांत निकाल लिए गए थे।
-वर्ष 2005 में 11 मई को फिर ग्वालगढ़ बीट में ही एक हाथी का शव मिला। इसके भी दोनों दांत निकाल लिए गए थे।
-वर्ष 2009 में दुगड्डा रेंज के नौड़ी वन क्षेत्र में कुसुमघाटी में वयस्क टस्कर का शव मिला, जिसके दोनों दांत गायब थे।
वर्जन —
वन विभाग की टीमें शिकारी से पूछताछ कर रही हैं। उसके साथियों की तलाश के लिए सघन कांबिंग चल रही है। इस बात का भी ध्यान रखा जा रहा है कि कहीं अन्य शिकारी तो यहां मौजूद नहीं हैं।
-संतोष विजय शर्मा, चीफ कंजरवेटर शिवालिक गढ़वाल
कार्बेट में कुछ दिन पूर्व तीन बाघों की मौत के बाद ही अलर्ट घोषित कर दिया गया था। लैंसडौन वन प्रभाग की घटना को देखते हुए गश्ती दलों को अधिक सतर्कता बरतने को कहा गया है।
-साकेत बड़ोला, उपनिदेशक कार्बेट टाइगर रिजर्व
लैंसडौन वन प्रभाग से जुड़े अमानगढ़ टाइगर रिजर्व और साहूवाला वन क्षेत्र में सतर्कता बरतने के निर्देश दिए गए हैं।
-सीपी मलिक, उप प्रभागीय वनाधिकारी बिजनौर वन प्रभाग
