
बिशन सिंह बोरा/देहरादून। आरक्षित वन क्षेत्र के बीच भूमि पर कब्जा करने के मामले में न सिर्फ पुलिस बल्कि राजस्व, सब रजिस्ट्रार और वन विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी सवालों में है। मामले की यदि उच्च स्तरीय जांच हो तो कई चेहरे बेनकाब हो सकते हैं। खास बात यह है कि सिद्धू ने सब कुछ जानते हुए फर्जीवाड़े की साजिश रची। वन विभाग को अंदेशा है कि मामले में तमाम अधिकारियों की मिलीभगत है। इस मामले में चार्जशीट भले ही दाखिल कर दी गई है, लेकिन कई सवालों के जवाब का इंतजार अब भी है।
कोर्ट में दाखिल जांच रिपोर्ट में वन विभाग ने कहा कि दाखिल खारिज से पहले पुलिस महानिदेशक अभियोजन वीरेंद्र सिंह सिद्धू ने वन दरोगा जगमोहन सिंह और वन दरोगा श्रीप्रसाद सकलानी से जमीन के बारे में पड़ताल की थी। वन विभाग के अधिकारियों ने तभी उन्हें आगाह कर दिया था कि यह भूमि आरक्षित वन क्षेत्र में है। यहां तक कि मौके पर उन्हें आरक्षित वन क्षेत्र के पिलर भी दिखाए थे। जांच अधिकारी वन दारोगा वीरेंद्र दत्त जोशी ने रिपोर्ट में बताया है कि सिद्धू ने नत्थूराम से जमीन खरीदने का दावा किया था, लेकिन जमीन की रजिस्ट्री में दर्ज डिस्पेंसरी रोड के पते पर रहने वाले नत्थूराम की मौत 1983 में हो चुकी है।
आठ गवाह, 18 सबूत
वन विभाग ने मामले में विभाग के कुछ अधिकारियों सहित आठ गवाह बनाए हैं। इनमें राजस्व विभाग के अधिकारी भी शामिल हैं। इसके अलावा प्रकाष्ठ की फर्द बरामदगी, रजिस्ट्री की प्रति, मौके का नजरी नक्शा, मौके के फोटोग्राफ्स, आईटी सेल से निकलवाया गया गुगल मैप सहित विभिन्न 18 साक्ष्य प्रस्तुत किए गए हैं।
