
टनकपुर। रक्षाबंधन का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है लेकिन तिवारी समुदाय का एक वर्ग ऐसा भी हैं, जो श्रावणी पूर्णमासी को रक्षाबंधन नहीं मनाता है। वे भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को कलाइयों में राखी बांधते हैं।
मां पूर्णागिरि धाम के तिवारी समुदाय के पुजारियों का एक वर्ग रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाते हैं। सामवेदों के अनुयायी और कोसमनि शाखा के इस समुदाय के लोगों ने इस बार भी बुधवार को न तो कलाई में राखी बांधी और न ही यज्ञोपवित बदला। इसके पीछे यह अलग-अलग तर्क देते हैं। कुछ कहते हैं कि ब्रह्मा द्वारा यज्ञोपवित बांटे जाते वक्त इस समुदाय के लोग नहीं पहुंच पाए थे। पंडित भुवन चंद्र पांडेय बताते हैं कि रक्षाबंधन का पर्व हस्त नक्षत्र में होता है। तिवारियों का यह समुदाय गौतम ऋषि का अनुयायी है। एक बार ऋषियों में विवाद हो गया। गौतम ऋर्षि विवाद में उलझ गए और हस्त नक्षत्र का समय निकल गया। बाद में हस्त नक्षत्र भाद्रपद के शुल्क पक्ष की तृतीया यानि हरतालीका में पड़ी तो तभी से ये इस दिन राखी और यज्ञोपवित धारण करते हैं।
