
हल्द्वानी। विकास के नाम पर चट्टानों को फाड़ कर बनाई जा रही सड़कें ही पहाड़ पर प्रलय की पटकथा रच रही हैं। पिछले पांच साल में ही सड़कें बनाने के लिए लोनिवि के महज चार खंडों ने पहाड़ों पर तीन लाख से अधिक डेटोनेटर और करीब डेढ़ लाख किलो जिलेटिन का प्रयोग किया है। भूगर्भविद जल्दबाजी में विस्फोट कर सड़क बनाने की इस प्रक्रिया को चिंता का विषय मानते हैं। सड़क बनाने का यह तरीका पहले से ही कच्चे पहाड़ों को अंदर तक हिला रहा है।
उत्तरप्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड को पर्यटन प्रदेश बनने की चाह में सरकार ने सुरक्षा के हर पहलू की अनदेखी है। पर्यटन विभाग के अनुसार उत्तराखंड में पूरे साल यहां की कुल जनसंख्या से करीब दोगुने पर्यटक पहुंचते हैं। राज्य बनने के बाद पर्यटकों की संख्या में 155 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इसमें भी धार्मिक पर्यटन पर आने वाले लोगों की संख्या अधिक है। इन पर्यटकों को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए राज्य बनने के बाद सरकार की विभिन एजेंसियों ने करीब 18 हजार किमी सड़क बनाई है। लोनिवि के एक अधिकारी के अनुसार कुमाऊं में ही प्रतिवर्ष 500 किमी से अधिक सड़क बनती है। इसमें करीब 250 किमी सड़क पहाड़ों पर होती है जिनके लिए विस्फोट करने पड़ते हैं।
आरटीआई कार्यकर्ता गुरविंदर चड्ढा द्वारा सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी चिंता में डालने वाली है। इससे पता चलता है कि पहाड़ों को तोड़ने के लिए रानीखेत खंड कार्यालय ने ही पिछले पांच साल में 550 किग्रा जिलेटिन और 2466 डेटोनेटरों का प्रयोग किया। इसके अलावा रामनगर खंड में 8700 किग्रा जिलेटिन और 112930 डेटोनेटरों, डीडीहाट खंड में 128674 किग्रा जिलेटिन, 14343 डेटोनेटर, नैनीताल खंड कार्यालय में 525 किग्रा जिलेटिन, 5550 डेटोनेटरों का प्रयोग किया गया। भूगर्भविद प्रोफेसर सीसी पंत के अनुसार सड़क बनाने के लिए विस्फोटकों का इस्तेमाल खतरनाक है। इससे पहाड़ों के भीतर कंपन पैदा होता है।
