जेल में की कंप्यूटर की पढ़ाई

सितारगंज। पढ़ने-लिखने की कोई उम्र नहीं होती और न ही कोई निश्चित जगह। चाहे शिक्षा का मंदिर हो या फिर जेल। ये साबित कर दिखाया है संपूर्णानंद शिविर खुली जेल के एक कैदी ने। 60 वर्ष से अधिक की उम्र में कंप्यूटर का ज्ञान लेने के बाद ये कैदी आज विभागीय कामों में हाथ बंटा रहा है। वैसे तो यहां अधिकतर कैदी निरक्षर हैं और जेल की कृषि भूमि पर काश्तकारी करते हैं। हां, इस कैदी को अफसोस है तो सिर्फ समय पूर्व मुक्ति की गुहार के बाद भी रिहाई का न मिलना।
उत्तर प्रदेश के गांव नगला चंदराम थाना गोण्डा जिला अलीगढ़ निवासी खुशीराम वर्मा ने आगरा यूनिवर्सिटी से एलएलबी की और उसके बाद अलीगढ़ मुंसिफ कोर्ट में करीब 15 वर्ष तक वकालत की। 1976 में गांव के ही ओंकार सिंह से जमीन की मेढ़ को लेकर विवाद हो गया और विवाद में ओंकार की मौत हो गई। जिसमें खुशीराम, उसके बड़े भाई भीमसेन व जगदीश को आजीवन कारावास की सजा हुई और तब से खुशीराम आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है। 28 मार्च 1997 को आगरा की केंद्रीय कारागार से यहां संपूर्णानंद शिविर (खुली जेल) में तीनों भाई सजा काटने आए। 13 फरवरी 2011 को 16 वर्ष की सजा पूर्ण करने और उम्र 60 वर्ष होने पर सजा माफी के शासनादेश के तहत भीमसेन व जगदीश रिहा हो गए। लेकिन खुशीराम की सजा माफ नहीं हुई।
वर्ष 2002 में खुली जेल में कैदियों को दिए गए कंप्यूटर प्रशिक्षण के दौरान खुशीराम ने कंप्यूटर का बेसिक ज्ञान अर्जित किया और तब से खुशीराम विभागीय कार्यों में जेल कर्मियों का हाथ बंटा रहा है। खुशीराम ने बताया कि खुली जेल में स्वतंत्र रूप से रहने की सुविधा तो है, पर उसको सिर्फ आखिर रिहाई न मिलने का सवाल कचोट रहा है। बकौल खुशीराम अब तक 17 वर्ष 10 माह की सजा काट चुका हूं और वर्ष 2000 से अब तक दो बार सजा पूर्व मुक्ति की फाइल लगाई। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका भी दायर की, पर किसी ने नहीं सुनीं। उसने उत्तर प्रदेश शासन से रिहाई की मांग की है।

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