
हल्द्वानी। पोलियो को गंभीर बीमारी माना जाता है। क्योंकि यह शरीर को विकलांग बना देती है। लेकिन ध्यान रहे ताकत शरीर में नहीं होती, इरादों में होती है। होश में आते ही पोलियो से लड़खड़ाने वाले पवन के इरादे भी मजबूत थे। इसलिए उसने वही खेल चुना जिसमें पैरों की ताकत ही आंकी जाती है। सात साल की उम्र में पहली किक भी उसी पैर से मारी जिस पर पोलियो था। आज पांच साल बाद पवन इसी पैर पर बाल नचाकर सबको दिखाता है कि फुटबाल खेलने के लिए मजबूत पैरों की नहीं मजबूत इरादों की जरूरत होती है।
उसने इस वर्ष पहली बार अपने विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर की टीम से नैनीताल के डीएसए मैदान में मैच खेला तो देखने वाले हतप्रभ रह गए। हर किसी ने इस छोटी सी जान के बड़े इरादों को सलाम किया। आप सोच रहे होंगे पवन कौन है? चलिए उसकी कहानी शुरू करते हैं। नैनीताल के बिड़ला स्कूल निवासी जशौद सिंह रावत के घर में तीसरी संतान के रूप में पैदा हुआ था पवन। बांया पैर पतला और दायां पैर से चार इंच बड़ा है।
पिता तब मजदूरी करते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने बेटे को इस बला (पोलियो) से दूर करने के लिए जीतोड़ जान लगाई। फिर एक प्राइवेट स्कूल में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी शुरू की। एक लाख 85 हजार रुपये खर्चे पवन के ऑपरेशन में और तब इस बच्चे की उम्र थी महज आठ माह। इलाज के बाद भी पोलियो ने उसका पैर नहीं छोड़ा। जब पवन होश में आकर सबकुछ पहचानने लगा तो उम्र की पहली ही सीढ़ी में उसकी मुलाकात हुई पोलियो से। नन्हे से दिल में तब दर्द बहुत हुआ था, लेकिन हिम्मत नहीं टूटी। सात साल में पहुंचते ही पवन ने फुटबाल में प्रेक्टिस शुरू की। आज तक उसके अभ्यास में बाधा नहीं आई है। वह रोज सुबह 4 बजे उठकर टीशर्ट-नेकर में बिड़ला मैदान दौड़ता है। वहां चार घंटे अभ्यास के बाद आठ बजे घर लौटता है और फिर स्कूल जाता है। कक्षा 6 में पढ़ने वाला पवन स्कूल की पढ़ाई खत्म कर घर लौटने के बाद भी फुटबाल को नहीं छोड़ता।
इस बार वह शिशु मंदिर की टीम में था तो डीएसए मैदान में उसने राइट हाफ खेला। किक मारने में वो पैर भी पीछे नहीं जिस पर पोलियो का दाग लगा है। इस पतले पैर को पवन की मेहनत ने पत्थर बना दिया है। वह फुटबाल के पीछे लड़खड़ाते हुए दौड़ता है, लेकिन कभी गिरता नहीं। जब हमने 12 साल में पोलियो को हराकर फुटबाल जीतने वाले इस बच्चे से बात की तो उसने दो टूक कहा। मैं एक सर्वश्रेष्ठ फुटबालर बनकर दिखाऊंगा। पवन को अब तक गुरु (कोच) नहीं मिला है। पिता जशौद सिंह बेटे की इस जीवटता से अपना सीना ठोंककर कहते हैं कि बेटे की जान वो फुटबाल है जिसे पोलियो ने डराया था।
इतनी कम में उम्र में और वो भी पोलियो जैसी बीमारी से लड़ फुटबाल में अच्छा प्रदर्शन करने वाले कम ही होते हैं। पवन बहुत अच्छा खेलता है। उसे मौके की जरूरत है। जिला क्रीड़ा एसोसिएशन (डीएसए) की तरफ से इस बच्चे का मनोबल बढ़ाने की कोशिश की जाएगी। -राजेंद्र रावत, महासचिव डीएसए नैनीताल।
