जहां बुने भविष्य के सपने, वे बने डरावने

कर्णप्रयाग। जिन घरों में भविष्य के सपने बुने थे, वे आज डरावने लग रहे हैं। घरों में रखा सारा सामान बहा गया। तन ढकने के लिए कपड़े तक नहीं बचे। अब रिश्तेदारों के घर और प्रशासनिक व्यवस्था पर रात गुजार रहे हैं।
सिमली रोड पर फोटो स्टूडियो चलाने वाले कोटी के राकेश कोटियाल इसी भवन के भूतल में दो कमरों के सेट पर बच्चों और बहिन के साथ रहते थे। 16 सिंतबर को वो सपरिवार गांव गए थे। जब 17 को लौटे, तो कमरे की दीवारें क्षतिग्रस्त हो चुकी थी। न सामान बचा न कपड़े। उमा देवी चौक पर इलेक्ट्रानिक की दुकान चलाने वाले बृजेश बिष्ट का गोदाम उफनती पिंडर में समा गया। अपने पुश्तैनी मकान में रह रहे प्रकाश देवली, प्रेम देवली, मनमोहन देवली और सुशील देवली ने कभी सोचा भी नहीं था कि आजादी से पहले बना हुआ उनका आशियाना इस प्रकार ढह जाएगा। बमुश्किल सामान बचाकर अब वन विभाग के भवन पर परिवार सहित रह रहे हैं, लेकिन अब आगे क्या होगा, यह सवाल बना हुआ है। परचून की दुकान चलाने वाले सुरेंद्र सिंह और हंसू की दुकान भी क्षतिग्रस्त हो गई है। अब घर वालों का भरण-पोषण कैसे होगा, यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य बीरेंद्र मिंगवाल, भाजपा के टीका प्रसाद मैखुरी ने प्रशासन से सभी प्रभावितों की उचित सहायता करने की मांग की है।

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