
बिलासपुर। प्रेस क्लब बिलासपुर में सोमवार को ‘यादें झील में डूबे शहर की’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। वरिष्ठ नागरिक सभा के महासचिव आरएल शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित गोष्ठी में वक्ताओं ने साठ के दशक में गोबिंदसागर में जलमग्न हो चुके पुराने बिलासपुर शहर की यादें ताजा कीं।
जीवन के कई बसंत पुराने शहर में व्यतीत कर चुके कुलदीप चंदेल ने कहा कि झील में डूबा बिलासपुर का पुराना शहर ऐतिहासिक था। वहां मिट्टी व पत्थरों के कच्चे घर, शिखर शैली के मंदिर, कुएं व पनघट तो थे ही, साथ ही बुजुर्गों की कई अन्य निशानियां भी थीं। तमाम धरोहरें राष्ट्र की खुशहाली के लिए भाखड़ा बांध के निर्माण से लुप्त हो गईं।
रविंद्र भट्टा ने पुराने शहर की ठठलियां व सांढू मैदान की यादें ताजा की। उन्होंने कहा कि पंगु का डोरा नामक स्थान पर छिंज होती थी। नाटक आदि का आयोजन भी वहां किया जाता था। पट्टयां रा नौण, चौंते रा नौण व पंजरुखी उस समय के स्वीमिंग पूल थे, जहां दिन भर रौनक छाई रहती थी। सांढू के मैदान में टेनिस, क्रिकेट, गोल्फ, फुटबाल व हाकी जैसे सभी खेल होते थे। केआर गर्ग ने कहा कि पुराने शहर में सबसे पहले वर्ष 1956-57 में सिलाई सेंटर खुला था। दिवंगत प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी, जो उस दौरान समाज कल्याण विभाग की अध्यक्ष थीं, ने उसका उद्घाटन किया था। मिट्टी के तेल से जलने वाली लालटेनों से स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की जाती थी। रंगनाथ के मेले भी बेहद मशहूर थे।
महबूब खान ने कहा कि खाखी शाह की मजार पर हिंदू, मुस्लिम, सिख सभी सिर झुकाते थे। मुशायरे, कवि सम्मेलन व रामलीला की रिहर्सल भी वहीं होती थी। पंडित गीताराम शर्मा ने बताया कि डियारा में वर्तमान में जहां विश्वकर्मा मंदिर है, वहां प्राचीन मंदिर था। वहां चश्मे व नौण भी हुआ करते थे। गोष्ठी में सुखराम आजाद, रामलाल पुंडीर, इंद्रेश शर्मा, रच्छपाल सिंह, सुरेंद्र शर्मा, अश्वनी सुहिल, आनंद सोहर, ओमप्रकाश, प्रताप भल्ला, ओंकार कपिल, बद्रीनाथ गुप्ता, रमेश धीमान व सुरेंद्र शर्मा ने भी पुराने शहर के कई किस्से सुनाए।
