चार महीने ही मिलता है मानदेय, बाकी बेरोजगार

चिन्यालीसौड़ (उत्तरकाशी)। आपदा के दौरान जान जोखिम में डालकर खोज एवं बचाव करने वाले प्रशिक्षित युवा स्थायी नियुक्ति न मिलने से भविष्य को लेकर आशंकित हैं। इन युवकों को साल में सिर्फ मानसून सीजन के चार माह ही रोजगार मिलता है। बीते चार सालों से इसी तरह सेवाएं दे रहे युवा अब नियमित नियुक्ति की मांग करने लगे हैं।
आपदा के लिहाज से बेहद संवेदनशील पहाड़ी जनपदों में आपदा प्रबंधन के उद्देश्य से प्रशिक्षित युवाओं को खोज एवं बचाव कार्य के लिए तैनात किया जाता है। इन्हें साल में सिर्फ मानसून सीजन के चार माह ही काम पर रखा जाता है। जिसकी एवज में इन्हें 220 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मानदेय दिया जाता है। वर्ष के शेष माह में ये फिर बेरोजगार हो जाते हैं। जिले में तैनात बचाव सहायक रघुवीर, पंकज बिष्ट, प्रमोद, हरिकांत आदि का कहना है कि उत्तराखंड के पहाड़ी इलाके वर्ष पर्यंत आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील हैं। यदि उन्हें वर्षभर काम पर रखा जाए तो आपदा प्रबंधन की स्थिति मजबूत रहेगी।
डीएमएससी के अधिशासी निदेशक पियूष रौतेला का कहना है कि आपदा प्रबंधन के लिए सूबे में 30 प्रशिक्षक नियमित तौर पर तैनात हैं। मानसून सीजन में विभिन्न जनपदों में 22 टीमें बनाकर इनमें 105 स्वयंसेवियों को तैनात किया जाता है। इन्हें पीआरडी जवानों की भांति मानदेय दिया जाता है। इनके नियमितीकरण का कोई प्रस्ताव नहीं है।

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