
देहरादून। आपदा के चलते बुजुर्ग यात्रियों को जहां चारधाम यात्रा पूरी न कर पाने का मलाल है वहीं जीवित लौटने की खुशी भी। यमुनोत्री, गंगोत्री से लौटे बुजुर्ग यात्री आपदा से बेहद डरे हैं। 40 से 50 किलोमीटर का पैदल सफर तय कर, रास्ते में कई गाड़ियों को बदलकर सुरक्षित देहरादून पहुंचे यात्रियों ने जब दर्द बताना शुरू किया तो सुनने वालों की आंखें भर आईं। शनिवार को यमुनोत्री, गंगोत्री से सुरक्षित बाहर निकले लोगों में तकरीबन 350 तीर्थयात्री बुजुर्ग थे।
बी कोटेश्वर राव उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं जब पैदल चलना किसी दुश्वारी से कम नहीं लेकिन घर पर इंतजार में बैठे नाती-पोतों का चेहरा उन्हें कई किमी पैदल ही खींच लाया। 73 वर्षीय राव अपनी 65 वर्षीय धर्मपत्नी बीआर तुलसी और तकरीबन 70 परिचितों के साथ विशाखापटनम से पहली दफा चारधाम यात्रा पर निकले लेकिन प्रकृति ने बीच में ही कदम रोक लिए। राव बताते हैं कि 14 जून को गंगोत्री से निकलते हुए ही तेज बारिश होने लगी। गंगोत्री से थोड़ी दूर निकले तो रास्ता टूट गया। बताते हैं कि 6 दिन जंगल और छोटे-छोटे कस्बों में गुजारने के बाद वह तकरीबन 60 किमी पैदल चलकर भटवाड़ी तक आए। रास्ते में मलबे से अटी सड़कों और टूटे रास्तों से वास्ता पड़ा जो उन्होंने इससे पहले कभी नहीं देखा। राव चारधाम न देख पाने और आपदा के कहर से दु:खी हैं।
बिहार की 60 वर्षीय निर्मला देवी मलबे में दबते-दबते बची। उनके साथ आई 65 वर्षीय सोना देवी और सत्यनारायण ने उन्हें जैसे-तैसे मलबे में दबने से बचाया। कुछ चोटें आई हैं लेकिन सुकून इस बात का है कि ट्रेन में लदकर ही सही घर लौट रही हैं। आगरा के लेखराज मंगलानी भी आठ साथियों के साथ 17 जून से गंगोत्री में फंसे थे। लेखराज कई किमी पैदल चलकर उत्तरकाशी के नजदीक मात्री गांव पहुंचे जहां से वह शनिवार को देहरादून पहुंच सके। लेखराज, राव, निर्मला जैसे ही 60 की उम्र पार कर चुके अधिकतर बुजुर्ग तीर्थयात्री एक हफ्ते की कष्टकारी यात्रा के बाद भूखे-प्यासे शनिवार को जब देहरादून रेलवे स्टेशन पहुंचे तो उनकी जुबां पर दर्द था और दिल में पहाड़ जीतने का सुकून।
