
शिमला। आपदा से निपटने की तैयारियों को लेकर हर साल की तरह इस साल भी ‘पर्व’ मना लिया गया। चाय-बिस्कुट का दौर चला और फिर भाषण। इसके बाद लंच की व्यवस्था भी हुई। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। हर बार ऐसा ही तो होता आया है। आपदा के लिहाज से शिमला को बेहद संवेदनशील बताया गया। वजह, बेतरतीब निर्माण। लेकिन इसको रोकेगा कौन? नीतियां फाइलों में दफन है और फाइलों को दीमक चाट रही है।
प्राकृतिक आपदा के प्रति जागरूक करने वाली संस्थाएं भी महज औपचारिकताओं तक सीमित हैं। सोमवार को मुख्य वक्ता ने बताया कि 25 हजार लोगों के लिए बसाए गए शिमला में डेढ़ लाख से अधिक लोग रह रहे हैं। असुरक्षित निर्माण के चलते शहर के हर नागरिक की जान खतरे में है। कृष्णानगर, रुलदूभट्ठा, संजौली, समिट्री और कच्चीघाटी में नियमों को ताक पर रखकर निर्माण हुआ है। भवन निर्माण भूकंप के खतरे को ध्यान में रखकर नहीं किया जा रहा है। नालों से सटे मकानों की नींव उठाई नहीं गई है। लोगों ने मकानों के आसपास सेट बैक तक नहीं छोड़े हैं। अवैध निर्माण को नियमित करने की अगर अनुमति मिलती है तो सरकार और प्रशासन लोगों की जान से खिलवाड़ को परमिट दे देगी। सोमवार को बचत भवन में आपदा प्रबंधन पर हुुई कार्यशाला में इन सभी बिंदुओं को लेकर चर्चा हुई। बीते साल हुई कार्यशाला में भी इसी तरह की चर्चाएं हुई थीं। लेकिन नगर निगम न तो नियमों को ताक पर रखने वाले भवनों पर अभी तक शिकंजा कस पाया और न ही भूकंपरोधी भवन बनाने के लिए अभी तक कोई नीति बना पाए।
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कार्यशाला में ये रहे मौजूद
महापौर संजय चौहान, मुख्य वक्ता राज्य परियोजना अधिकारी (एसएसए) डीसी राणा, उप महापौर टिकेंद्र पंवर, सहायक आयुक्त नरेश ठाकुर, पार्षद अनूप वैद, शशि शेखर चीनू, सुषमा कुठियाला, कांता स्याल, कुसुम ठाकुर, दीक्षा ठाकुर आदि मौजूद रहे।
