
हरिद्वार। सन 1857 में गदर हुआ था। इसकी काफी योजनाएं मेरठ में बनी। किंतु महत्वपूर्ण योजनाओं को हरिद्वार के चंडी वन में अंजाम दिया गया। बाद में करीब 110 वर्ष पूर्व कई क्रांतिकारी स्वामी श्रद्धानंद से दिशा-निर्देश लेने पार कांगड़ी गुरुकुल आते रहे।
इतिहासकारों के अनुसार 1855 में जुत्शी बाबा के नेतृत्व में पांच प्रमुख क्रांतिकारियों ने चंडी के जंगल में बैठकर पहले गदर को अंजाम देने की योजनाएं बनाई। इनमें महाराजा लंढौरा भी शामिल थे। बुलंदशहर के प्रमुख क्रांतिकारी दयाल साहू समन्वयक की भूमिका निभा रहे थे। बाद में मेरठ के ऐतिहासिक काली पलटन मंदिर में गदर के पूरे सूत्र रचे गए।
स्वामी श्रद्धानंद ने करीब 112 वर्ष पूर्व पार कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की थी। शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजों को भगाने का स्वप्न उन्होंने देखा था। प्रसिद्ध क्रांतिकारी वीर सावरकर, केशवचंद्र, बाबा अवधूत, राजगुरु और मनमथनाथ गुप्त जैसे क्रांतिकारी देश को आजाद कराने की मंत्रणा गुरुकुल में बैठकर करते थे। नीलधारा के उस पार स्थित दक्षिण कालीपीठ पर विख्यात तांत्रिक बाबा कामराज और इस पार केशव आश्रम लाहिडी महाशय के सानिध्य में भी स्वाधीनता आंदोलन के कई ताने बाने बुने गए। पुरोहितों ने भी क्रांतिकारियों के संदेशों का आदान-प्रदान यजमानों को दिए जाने वाले प्रसाद के माध्यम से किया।
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हरिद्वार के सेनानियों के चित्र कहीं नहीं
हरिद्वार। तीन स्थानों पर एक साथ तिरंगा फहराकर अमर शहीद हुए जगदीश चंद्र वत्स के अलावा हरिद्वार के अधिकतर क्रांतिकारियों के चित्र मौजूद नहीं हैं। पूर्व विधायक अंबरीष कुमार के प्रयत्नों से शहर कोतवाली के सामने भल्ला पार्क को शहीद पार्क बनाकर कीर्ति स्तंभ पर सेनानियों के नाम तो लिखे किंतु उनके चित्र कहीं नहीं लग पाए। कई सेनानी ऐसे हैं जिनके परिजनों के पास चित्र मौजूद हैं। सुखद पहलु यह है कि हरिद्वार में नेताजी सुभाष, ऊधमसिंह और भगत सिंह जैसे शहीदों के नाम से स्थान और चौक मौजूद हैं।
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चंडी वन क्षेत्र पहले से क्रांतिकारियों को आकर्षित करता रहा है। खोज के दौरान पता चला की अघोरियों और तांत्रिकों से भरे इस वन में प्रसिद्ध क्रांतिकारी भी अघोरियों का वेष बनाकर आते थे। चंडी वन जहां आल्हा-ऊदल, रानी मछला, सुलताना आदि से जुड़ा वहीं यह क्षेत्र क्रांतिकारियों की कर्म भूमि भी रहा। इस क्षेत्र का मूल्यांकन इतिहास नहीं कर पाया।
डॉ. सत्यकेतू विद्यालंकार, प्रसिद्ध इतिहासकार
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-हरिद्वार ही नहीं प्रयाग और काशी के पुरोहितों ने भी देश को आजाद कराने में योगदान दिया। तीनों नगरों के पुरोहितों ने यजमानों के माध्यम से क्रांतिकारियों के संदेशों को यहां से वहां भिजवाया। हरिद्वार के पुुरोहितों ने यह कैसे किया इसका विवरण डॉ. सिद्धार्थ चक्रवर्ती द्वारा लिखित ‘अमर क्रांतिकारी’ नामक पुस्तक में भी मिलता है।
पंडित राजीव नंदन मिश्र, वैदिक विद्वान, काशी।
