
मंडी। विपाशा के तट पर बसे मंडी शहर के प्राचीन वैभव को लौटाने की कई बार घोषणाएं हुई हैं, मगर हकीकत की जमीन पर कोई भी घोषणा मूर्तरूप में सामने नहीं आई है। नदी घाटी सभ्यता के प्रतीक हिमाचल के प्राचीन शहर मंडी में ब्यास-सतलुज लिंक बनने के बाद ब्यास नदी और उसके घाटों का वैभव समाप्त हो गया है। ब्यास नदी के इन घाटों में साल भर पानी लबालब भरा रहे, इसके लिए राजनीतिक मंचों से कई बार घोषणाएं हुई हैं। ब्यास नदी पर मंडी के पास कृत्रिम झील बनाकर इसकी पूर्व की स्थिति को बहाल करने के लिए अनेक बार घोषणाएं हो चुकी हैं। इस झील में वाटर स्पोर्ट्स जैसी अनेक गतिविधियों के अलावा पर्यटन विकास को बढ़ावा देने की भी बात की जाती रही है। पूर्व में हुए लोकसभा चुनाव में भी यह मुद्दा सियासी फिजा में छाया रहा, मगर चुनाव का मौसम गुजर जाने के बाद यह मुद्दा भी नेताओं की प्राथमिकता के दायरे से बाहर हो गया। हालांकि, केंद्रीय मंत्री रहते हुए वीरभद्र सिंह ने मंडी में कृत्रिम झील बनाने की बात कही थी। इस बारे में केंद्र में मामला उठाने की बात भी कही थी, मगर इस पर करोड़ों नहीं अरबों रुपये की धनराशि खर्च होने की संभावना के चलते धीरे-धीरे यह मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया। वर्तमान में मंडी लोकसभा उपचुनाव में अभी तक किसी भी दल ने इस मुद्दे को नहीं उठाया है। इसके विकल्प के रूप में कूनकातर में बनने वाली जल विद्युत परियोजना का जल स्तर बढ़ने से मंडी के आसपास कृत्रिम झील बनने की बात नेताओं की ओर से की जा रही है। अब इस बात में कितना दम है, यह तो इस परियोजना के व्यवहारिक रूप में आने के बाद ही चल पाएगा।
स्थानीय निवासी प्रेम कुमार, सुरम सिंह, दिनेश कुमार, जीत राम व कृपा चंद आदि कहना है कि पर्यटन की दृष्टि से ब्यास नदी पर कृत्रिम झील बनाई जानी चाहिए। सियासी दल कई बार घोषणा कर चुके हैं, लेकिन यह योजना घोषणा तक ही सीमित रही। अगर कृत्रिम झील बनती है तो पर्यटक यहां ठहरेंगे, जिससे लोगों को रोजगार भी मिलेगा।
