ग्लेश्यिरों, नदियों पर निगाह होती तो कम होता नुकसान

प्रदेश के सरकारी अमले ने अपनी ही बनाई कमेटी की संस्तुतियों पर ध्यान दिया होता तो शायद बदरी-केदार की घाटी के जख्म इतने गहरे न होते।

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2006 में ही ग्लेशियर पर बनी कमेटी ने साफ कहा था कि प्रदेश में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं के लिए जल संग्रहण क्षेत्र में मानिटरिंग करना अनिवार्य किया जाए। मतलब यह कि नदियों के उद्गम से ही पानी की मात्रा पर जल विद्युत परियोजनाएं नजर रखें। अगर यह तंत्र विकसित कर लिया गया होता तो केदारघाटी और बदरनीनाथ की घाटी में 16-17 जून को भारी बरसात से इतना नुकसान न होता।

2006 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के निर्देश पर गठित ग्लेशियर कमेटी का साफ कहना था कि प्रदेश में करीब 127 ग्लेशियर झील हैं। इनका कुल क्षेत्रफल करीब 75 वर्ग किलोमीटर है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में टूट-फूट होती रहती है, लिहाजा अचानक आने वाली बाढ़ से इनकार नहीं किया जा सकता है।

आपदाओं के नुकसान को कम किया जा सकता था
छह साल पहले बनी इस कमेटी की संस्तुतियों पर गौर किया जाए तो यह साफ है कि 2010 से लेकर 2013 तक की आपदाओं के नुकसान को कम किया जा सकता था। अलकनंदा में बदरीनाथ से लेकर लामबगड़ तक कोई नुकसान नहीं हुआ। लामबगड़ में जल विद्युत परियोजनाओं के प्रबंधन को इतना मौका ही नहीं मिला कि अलकनंदा में अचानक पानी आने पर बैराज के गेट खोल पाते।

लिहाजा पानी किनारों को काटकर अपने साथ करीब चार किलोमीटर की सड़क भी ले गया। सड़क के इस मलबे ने गोविंदघाट में नुकसान पहुंचाया। यही हाल मंदाकिनी का भी रहा। विजयनगर के लोगों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि नदी का तल कई मीटर मलबे के कारण उठ जाएगा। इसी तरह 2012 में उत्तरकाशी में अस्सी में आई बाढ़ में संगम चट्टी में नदी का तल मलबे के कारण करीब 20 मीटर ऊपर उठ गया था।

जाहिर है कि इन नदियों में बनी जल विद्युत परियोजनाओं की ओर से नदी के पानी की मॉनिटरिंग हो रही होती और मौसम केंद्र स्थापित होते तो 2013 की आपदा इतना भयावह रूप न ले पाती।

क्या थीं संस्तुतियां
-जल विद्युत परियोजनाओं के लिए संबंधित नदी के जल संग्रहण क्षेत्र केऊपरी हिस्से में मौसम केंद्रों और नदी केमापने के लिए केंद्र स्थापित किया जाना अनिवार्य किया जाए।
-ग्लेशियरों से निकले वाली नदियों के जल संग्रहण क्षेत्र की आबादी की पूरी मैपिंग की जाए जिससे यह पता लग सके कि कोई ग्लेशियर टूटने पर कितनी आबादी को प्रभावित कर सकता है।

-ग्लेशियरों के पिघलने और अन्य तरह की जानकारी का डाटा बेस बनाया जाए। इस तरह की जानकारी का उपयोग अचानक आने वाली बाढ़ और नदियों में पानी केप्रवाह के अध्ययन में उपयोगी होगा।
-संवेदनशील क्षेत्रों में पर्यटकों आवाजाही और अन्य गतिविधियों को सीमित किया जाए।
-बांध, बैराज और जल विद्युत परियोजनाओं के लिए ग्लेशियरों को ध्यान में रखते हुए रिस्क एनालिसिस किया जाए।
-केदारनाथ और बदरीनाथ के ऊपर के ग्लेशियरों की निरंतर निगरानी होनी चाहिए और इनसे निकलने वाले पानी केप्रवाह पर भी नजर रखी जानी चाहिए।

-पूर्व में हिमनद प्राधिकरण बनाया गया था। वर्तमान सरकार ने अन्य संस्थानों के सक्रिय होने का हवाला देते हुए इस प्राधिकरण को खत्म कर दिया था। विभिन्न ऐजेंसियों के बीच समन्वय का सवाल अभी जस का तस है। हाल यह है कि कुछ दिन पहले ही बदरीनाथ के उच्च हिमालयी क्षेत्र में झील बनने पर हिमालयन वाडिया भूगर्भ विज्ञान संस्थान और रिमोट सेंसिंग के बीच ही विवाद उठ खड़ा हुआ। रिमोट सेंसिंग ने झील बनने की बात की और वाडिया ने कहा कि कोई झील नहीं बनी है।

माउंटेन टास्क फोर्स ने स्पष्ट संस्तुति की थी कि ग्लेशियरों की लगातार निगरानी की जाए और संबंधित सभी संस्थाओं को एक छतरी के नीचे लाया जाए। ऐसे में आपदा प्रबंधन का काम भी आसान हो जाता।
-डा. आरएस टोलिया, पूर्व मुख्य सचिव और माउंटेन टास्क फोर्स के अध्यक्ष

यह साफ है कि इस बार की भारी बरसात में नुकसान जल विद्युत परियोनाओं के कारण ज्यादा हुआ। इन परियोजनाओं के बैराजों ने पानी को रोका और टूटने के बाद निचले क्षेत्रों में पानी के वेग को बढ़ा दिया।
-रवि चोपड़ा, निदेशक, पीपुल्स साइंस इंस्टीट्यूट

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