
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायलय ने ग्रेच्युटी और पेंशन पर कहा कि पेंशन तो एक तरह से ‘संपत्ति’ है। कोर्ट ने कहा है कि विभागीय या आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के आधार पर सरकार इस अधिकार से कर्मचारी को वंचित नहीं कर सकती है। जज केएस राधाकृष्णन और जज एके सीकरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा है, ‘यह स्वीकार्य स्थिति है कि ग्रेच्युटी और पेंशन ईनाम नहीं है।
एक कर्मचारी लगातार, निष्ठापूर्वक लंबी अवधि तक नौकरी करके ये लाभ अर्जित करता है। इसलिए यह मेहनत से अर्जित लाभ है, जो एक कर्मचारी जमा करता है और यह ‘संपत्ति’ जैसा ही है।’ जजों ने कहा, ‘इस संपत्ति के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 300-ए के प्रावधानों के अनुरूप कानूनी प्रक्रिया का पालन किये बगैर उससे नहीं लिया जा सकता है।’ कोर्ट ने झारखंड हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुये यह व्यवस्था दी।
हाई कोर्ट ने जीतेन्द्र कुमार श्रीवास्तव नाम के सेवानिवृत्त कर्मचारी की बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार ने उसके खिलाफ आपराधिक मामले लंबित होने के आधार पर ये भुगतान रोक लिये थे। जजों ने कहा, ‘हमारी राय है कि संविधान के अनुच्छेद 31 (1) के तहत पेंशन प्राप्त करना श्रीवास्तव का अधिकार है और एक सरकारी आदेश के तहत इसे रोकने का राज्य को अधिकार नहीं है।’
कोर्ट ने कहा कि श्रीवास्तव को पेंशन के अधिकार से वंचित करने संबंधी 12 जून, 1968 का आदेश संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (एफ) और अनुच्छेद 31 (1) के तहत उसके मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है। कोर्ट ने कहा कि कानूनी व्यवस्था के बगैर किसी व्यक्ति को उसकी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता।
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के 31 अक्तूबर, 2007 के आदेश को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि बिहार पेंशन नियमों के तहत सरकार को विभागीय या आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के दौरान ग्रेच्युटी और पेंशन रोकने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि सरकार को कार्यवाही के दौरान या कार्यवाही पूरी होने के बाद छुट्टियों की एवज में देय राशि रोकने का अधिकार नहीं है।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका पर यह व्यवस्था दी। यह कर्मचारी रांची में 2002 में सेवानिवृत्त हुआ था और चाहता था कि उसकी आंशिक पेंशन और अन्य देय राशि का भुगतान किया जाये। इस कर्मचारी ने बिहार सरकार के पशुपालन और मतस्य विभाग में 1966 में नौकरी शुरू की थी। इसके खिलाफ 1990 और 1991 के दौरान वित्तीय अनियमित्ताओं के आरोप में 1996 में भारतीय दंड संहिता ओर भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत दो मामले दर्ज किये थे। झारखण्ड राज्य के गठन के बाद याचिकाकर्ता इन दो मामलों में आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के दौरान ही इस राज्य का कर्मचारी हो गया था। याचिकाकर्ता के 2002 में सेवानिवृत्त होने पर सरकार ने उसकी 90 फीसदी तदर्थ पेंशन मंजूर की जबकि दस फीसदी पेंशन और निलंबन अवधि का वेतन लंबित आपराधिक कार्यवाही का निबटारा होने के आधार पर रोक लिया गया था।
