ग्रामीणों के मिले हाथ तो उजड़ने से बच गया गांव

दुगड्डा। आपदा की मार से इस समय पूरा उत्तराखंड कराह रहा है। इस तबाही के पीछे प्रकृति से छेड़छाड़ को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। ऐसे में दुगड्डा प्रखंड का महरगांव उत्तराखंड के हर उस गांव के लिए नजीर बन सकता है जो आपदा में प्रभावित हुए हैं। 23 साल पहले भूस्खलन की बड़ी मार झेल चुके इस गांव के लोगों ने अपने घरों-खेतों को बचाने का बीड़ा खुद उठाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि वहां न केवल नदी से भूकटाव रुका है बल्कि क्षेत्र का सबसे घना जंगल भी यहां विकसित हो चुका है। खास बात यह कि बीते दस साल में इस गांव के जंगल में कभी आग लगने की कोई घटना सामने नहीं आई है।
दुगड्डा प्रखंड में ऐता-उमरैला मार्ग से करीब एक किलोमीटर पैदल दूरी पर वन पंचायत महरगांव स्थित है। वर्ष 1948 में पंचायत के गठन के वक्त यहां वन क्षेत्र 52.200 हेक्टेयर था। बाद के वर्षों में अलग-अलग कारणों से यह काफी कम हो गया। वर्ष 1990 में बरसात से खोह नदी उफनी तो यहां काफी भूस्खलन हुआ। गांव की खेती नष्ट हो गई और पहाड़ी दरकने से भी काफी नुकसान हुआ। सरकार से मदद की दरकार थी। इसके बाद ग्रामीणों ने गांव को बचाने का संकल्प लिया और जंगल के संरक्षण और भूकटाव रोकने के लिए जरूरी उपाय किए। पुश्ते बनवाए। जलागम और उद्यान विभाग की मदद से सुरक्षा के अन्य प्रबंध भी किए गए, जो बाद में वन पंचायत के अधीन कर दिए गए।

प्राकृतिक स्रोत से बुझती है प्यास
दुगड्डा। गांव में अब तक पेयजल लाइन नहीं पहुंची है, लेकिन जंगल बढ़ने से यहां प्राकृतिक जलस्रोत इस तरह रिचार्ज हुए कि अब वर्षभर इनसे पर्याप्त पानी मिल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे आसपास के जरूरतमंद गांवों को भी पानी दे सकते हैं।

जंगल के साथ औषधीय पेड़ भी
दुगड्डा। वन पंचायत क्षेत्र में साल, चीड़, जामुन, पीपल, रोहणी, सफेद सिरस के पेड़ों के साथ ग्रामीणों ने मालझन, किनगोड़ा, हिंसर, बांस, अंडूसा जैसे औषधीय पौधे भी यहां लगाए गए हैं।

सरकार से नहीं मिलती कोई आर्थिक मदद
दुगड्डा। महरगांव की खासियत यह है कि यहां जल, जंगल, जमीन की सुरक्षा पर खर्च होने वाली रकम का पूरा प्रबंध ग्रामीण खुद मिल-जुलकर करते हैं। सरकार के स्तर पर इस वन पंचायत को कोई राशि नहीं मिलती है। गर्मी के मौसम में जंगल में आग की घटनाओं पर रोकथाम के लिए करीब चार महीने तक यहां वन पंचायत गार्ड को तैनाती करती है, जिसकी तनख्वाह सरपंच खुद अपनी जेब से देते हैं।

हाथियों को मिला प्राकृतावास
दुगड्डा। सामान्यत: हाथी कोटद्वार-दुगड्डा मार्ग पर दुर्गा देवी मंदिर से ऊपर नहीं जाते। लेकिन इस वन पंचायत में लगे बांस के जंगल यहां हाथियों के लिए प्राकृतावास बन चुके हैं। हर साल दुगड्डा रेंज के नौड़ी के जंगल से हाथियों के झुंड यहां आते हैं। इसके अलावा काकड़, घुरल, सांभर जैसे वन्यजीव भी यहां बहुतायत में हैं।

गांव हमारा है तो यहां की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमें ही उठानी होगी। हमारे यहां जल, जंगल, जमीन के संरक्षण के लिए हर ग्रामीण की जिम्मेदारी तय है। यही वजह है कि मानवीय दबाव के बावजूद यहां वन अपराध की कोई घटना नहीं होती। दस साल से कभी आग नहीं लगी। मैं खुद संवेदनशील स्थानों पर नजर रखता हूं। -गिरीश चंद्र गौड़, सरपंच, वन पंचायत महरगांव

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