
मानसून की पहली ही दस्तक से ऐसे निशानों की कल्पना आपदा के संग जीवन गुजार देने वाले लोगों ने भी नहीं की थी। गोविंद घाट में पूरे गुरुद्वारा के ही डूबने और रुद्रप्रयाग में पुल के ऊपर से पानी बहने की बात तो किसी ने सोची भी नहीं होगी। गढ़वाल में पिछली बार अस्सी गंगा ने कहर बरपाया था, इस बार मंदाकिनी का रौद्र रूप सामने आया। यही हालात कुमाऊं के भी हैं।
राहत देने के बजाय जख्म दे गया
लगता है पहाड़ की नदियां गुस्से में हैं। मानसून इस बार गरमी से राहत देने के बजाय जख्म दे गया। जख्म भी ऐसे कि शायद ही भर पाएं। पानी 2011 में भी बरसा था। पूरे प्रदेश को बरसात ने अपनी चपेट में लिया था। करीब 14 हजार किमी. सड़क ध्वस्त हो गई थीं। प्रदेश का कोई कोना नहीं था जिस पर मानसून ने अपने निशान न छोड़ें हों। लेकिन 2013 के जून माह की कुछ घंटों की बरसात ने वह खौफ पैदा किया जो 2011 नहीं कर पाया।
गोविंद घाट में उस समय की बरसात में भी इतना नुकसान नहीं हुआ था। गोविंदघाट में गुरुद्वारा नदी तट से खासा ऊपर है और इसके बावजूद यह पूरा डूब गया। यहां से एक हेलीकाप्टर और कई वाहन ही पानी में बह गए। रुद्रप्रयाग जिले का भी यही हाल है। भाजपा नेता और रुद्र्रप्रयाग के विजयनगर निवासी अजेंद्र अजय के रुद्रप्रयाग में पुल के ऊपर से पानी बहने के बारे में किसी ने नहीं सोचा था। नदी किनारे बसे लोग खासी दूरी पर हैं। इसके बाद भी घरों में पानी घुसा।
जून में इतना पानी कभी नहीं देखा गया
चंपावत विधायक हेमेश खर्कवाल के मुताबिक शारदा नदी में जून माह में इतना पानी कभी नहीं देखा गया। नदी मे करीब साढ़े चार लाख क्यूसेक पानी आया। रामबाड़ा भी केदारनाथ मार्ग पर एक सुरक्षित पड़ाव था। मंदाकिनी इतना विकराल रूप धारण कर लेगी कोई सोच भी नहीं सकता। कृषि मंत्री हरक सिंह के मुताबिक इस बार की बरसात मे उन पुलियाओं को भी नुकसान पहुंचा है, जिनके क्षतिग्रस्त होने की कल्पना बड़े बूढ़ों ने भी नहीं की थी।
