
मंगलौर। आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों के साथ मिलकर अंग्रेजों के साथ लोहा लेने वाले लिब्बरहेड़ी निवासी पंडित देवदत्त शर्मा इस दुनिया से गुमनाम ही विदा हो गए। काफी कोशिशों के बावजूद प्रशासन ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा नहीं दिया, जबकि दावा किया जाता रहा है कि उन्होंने क्रांतिकारियों के साथ मिलकर टेलीफोन लाइन काटने और क्रांतिकारियों को असलाह पहुंचाने जैसे कार्य किए थे। कक्षा आठ में उन्होंने स्कूल से ब्रिटिश ध्वज उतारकर तिरंगा फहराया था।
देश के जिन वीर सपूतों ने देश को अंग्रेजों से आजाद कराने के लिये संघर्ष किया, उनमें लिब्बरहेड़ी के देवदत्त शर्मा का नाम भी शामिल है। यह अलग बात है कि उनकी इस देशभक्ति को कोई पहचान नहीं मिल पाई। दावा किया जाता है कि 1942 में कक्षा आठ में पढ़ने के दौरान उन्होंने रुड़की के डीएवी स्कूल में ब्रिटिश ध्वज उतारकर तिरंगा फहराया था। इसके बाद उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया था। क्षेत्र के क्रांतिकारी जयद्रथ महाशय एवं जीवन सिंह आदि के साथ मिलकर देवदत्त शर्मा ने टेलीफोन सेवाएं ठप करने के लिये तार काटने, अंग्रेजों के विरुद्ध पर्चे बांटे। इसे देखते हुए अंग्रेजों ने दो बार उनकी गिरफतारी के वारंट जारी किये। गिरफतारी से बचने के लिये देवदत्त शर्मा भूमिगत हो गये और तीन साल तक पंजाब में रहकर देश के स्वाधीनता संग्राम में शिरकत करते रहे। आजादी के बाद उनके साथियों को तो स्वतत्रंता संग्राम सेनानी का दर्जा हासिल हो गया, लेकिन उन्होंने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। 1954 से लेकर 1982 तक उन्होंने मंगलौर के नेहरू राष्ट्रीय इंटर कालेज तथा गागलहेड़ी के इंटर कालेज में अध्यापन कार्य किया। 18 जुलाई को 97 वर्ष की आयु में लिब्बरहेड़ी में उनका निधन हो गया। हरिद्वार में हुए अंतिम संस्कार के दौरान उनके परिजन और परिचित ही मौजूद रहे। उनके पुत्र सेवानिवृत्त कानूनगो दयानंद गौतम का कहना है कि उनके पिता ने खुद को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को मिलने वाली सुविधाएं देने के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकार से कई बार मांग की, लेकिन उन्हें सरकार से आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। लिब्बरहेड़ी निवासी मनोज शर्मा और शाकिर का कहना है कि प्रशासन को स्वर्गीय देवदत्त शर्मा का लिब्बरहेड़ी में स्मारक बनवाना चाहिये ताकि आने वाली पीढ़ी अपने पूर्वजों के बलिदान को याद रख सके।
