
अल्मोड़ा। विभिन्न संगठनों ने जिलाधिकारी के माध्यम से प्रधानमंत्री को ज्ञापन भेजकर गरीबी की परिभाषा को नए सिरे से परिभाषित करने की मांग की है। ज्ञापन में कहा गया है कि आज चीजों के दाम इतने बढ़ गए हैं कि अच्छी खासी आमदनी वालों को भी परिवार का गुजारा करने में मुश्किल हो रही है। दूसरी तरफ देश के योजना आयोग ने अपने आकलन से गरीबों का मजाक उड़ाने का ही काम किया है।
ज्ञापन में कहा गया है कि योजना आयोग ने ग्रामीण इलाकों में 27.20 रुपये और शहरी इलाकों में 33.33 रुपये प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी की रेखा से ऊपर माना है। योजना आयोग के नए आकलन से हिसाब लगाया जाए तो गरीबों की संख्या 37.2 से घटकर 21.9 प्रतिशत रह गई है। जन संगठनों का कहना है कि गरीबों का आकलन करने में सरकार भी स्वयं भ्रम की स्थिति में है। एक तरफ सरकार 21.9 प्रतिशत जनता को ही गरीब मान रही है दूसरी ओर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में 67 प्रतिशत जनता को सस्ता अनाज देने की बात की जा रही है।
इन संगठनों ने कहा है कि विश्व बैंक ने भी गरीबी की रेखा के ऊपर की न्यूनतम आय दो डालर प्रतिदिन, मतलब 96 रुपये प्रतिदिन तय की है। ज्ञापन में कहा गया है कि योजना आयोग की रिपोर्ट में उत्तराखंड को लेकर भी काफी खामियां हैं। यहां 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं कुपोषित हैं। कई बच्चे भी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण का शिकार हैं। आपदा के बाद उत्तराखंड की स्थिति काफी खराब हो गई है। इन परिस्थितियों को देखते हुए योजना आयोग के आंकड़ों को तुरंत खारिज करके इस मसले पर संसद में बहस कराई जाए। ज्ञापन देने वालों में लोक प्रबंध विकास संस्था के सचिव ईश्वरी दत्त जोशी, डीवाईएफआई के कार्यकारी अध्यक्ष दिनेश पांडे, वन पंचायत सरपंच संगठन के अध्यक्ष सतीश चंद्र पांडे, ग्राम प्रधान संगठन के चंदन सिंह बिष्ट, दीप्ति भोजक आदि शामिल थे।
