गत्ता उद्योग बंद होने के कगार पर

बद्दी (सोलन)। गत्ता उद्योग उत्पादक प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अन्य राज्यों से पिछड़ रहे हैं। प्रदेश की पेपर मिलों में पेपर के दाम बाहरी राज्यों की अपेक्षा बहुत अधिक हैं। उत्पादन लागत अधिक होने से सेब उत्पादक बाहरी राज्यों से गत्ता मंगा रहे हैं जिससे प्रदेश सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व का चूना लग रहा है।
बीबीएन में प्रदेश का 80 फीसदी गत्ता तैयार होता है। प्रदेश में मात्र छह पेपर मिल हैं। यहां पर पेपर मिल से मिलने वाला पेपर महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ रही है। पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश में पेपर मिल अधिक होने से वहां पर पेपर सस्ता है। सस्ता होने से गत्ता भी सस्ता तैयार हो रहा है। प्रदेश में सेब सीजन के दौरान 3 करोड़ गत्ते के डिब्बे की खपत है जिसमें डेढ़ करोड़ गत्ते के डिब्बे बाहरी राज्यों से आते हैं जिससे प्रदेश सरकार को 3 सौ करोड़ रुपये का राजस्व का नुकसान हो रहा है।
वर्तमान में प्रदेश के दो सौ गत्ता उद्योगों में दस हजार कामगार नौकरी कर रहे हैं। अगर सरकार गत्ता उद्योग में लगने वाले पेपर के दाम नियंत्रित करके गत्ता उत्पादकों को मुहैया कराती है तो चार हजार कामगारों को रोजगार मिलेगा। साथ ही सरकार को करोड़ों रुपये का राजस्व का फायदा मिलेगा।
लघु उद्योग भारती के प्रदेश अध्यक्ष तजेंद्र गोयल ने बताया कि लघु उद्योग प्रदेश में युवाओं को सबसे ज्यादा रोजगार मुहैया करा रहे हैं। साथ ही सबसे अधिक राजस्व भी सरकार को मुहैया करा रहे हैं लेकिन पेपर मिलों की मनमानी के चलते यह उद्योग बंद होने के कगार पर है। अगर यहां पर स्थापित उद्योग बाहर की पेपर मिलों से पेपर मंगाते भी हैं तो उन्हें सीएसटी लगा कर रेट उतना ही पड़ रहा है जिससे यहां क ा गत्ता उद्योग मंदी से उभर नहीं पा रहा है। सेब प्रदेश की आर्थिक की रीढ़ है। अगर यहां के गत्ता उद्योगों को कम कीमत पर पेपर उपलब्ध कराया जाए या सेब सीजन के दौरान बाहरी से आने वाले डिब्बे पर एंट्री टेक्स लगाया जाएगा तभी यहां के गत्ता उद्योग मंदी से उभर पाएंगे तथा युवाओं को रोजगार के साथ-साथ नए उद्योग भी आकर्षित होंगे।

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