खनन बनता है तबाही का कारण

सितारगंज। क्षेत्र में बेतरतीब ढंग से हुए खनन और नदियों में जमी सिल्ट बाढ़ का मुख्य कारण है। हर वर्ष नदियां अपना रुख परिवर्तित करती हैं। जिससे नदियां मूल स्थान छोड़कर किसानों की जमीन से होकर बह रही हैं। नदियों का रुख सीधा करने के लिए शासन-प्रशासन की तरफ से कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं। बस, कवायद की जाती है, तो सिर्फ नदियों में बाढ़ से बचाव के लिए फौरी मरम्मत की। बारिश के दस्तक देते ही किसानों की धड़कनें तेज हो गई हैं। करीब तीन दर्जन गांवों के लोगों की सांसे थम गई हैं।
प्रदेश का वीवीआईपी क्षेत्र सितारगंज चारों ओर से नदी और जलाशयों से घिरा हुआ है। क्षेत्र की प्रमुख कैलाश और बैगुल नदी हैं। पहाड़ से निकलने वाली नंधौर नदी (कैलाश नदी) में हर वर्ष करोड़ों रुपये के खनन का कारोबार होता है। चोरगलिया तक नंधौर के नाम से पहचानी जाने वाली कैलाश नदी के साधूनगर और उकरौली खनन क्षेत्र में माफियाओं द्वारा हर वर्ष धड़ल्ले से अवैध खनन किया जाता है। जिससे नदी अपना रुख बदल देती है और इसका खामियाजा आसपास के ग्रामीण भुगतते हैं। गत पांच वर्षोें में डेढ़ दर्जन गांवों की करीब चार सौ एकड़ भूमि नदियों में कटकर समा गई है।
इस वर्ष भी सिंचाई विभाग द्वारा झुकहा, कौंधाअसरफ, डोहरा, तुर्कातिसौर, उकरौली गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए कैलाश नदी में दैवीय आपदा मद से 1.45 करोड़ और विशेष योजना मद से सन्तफार्म, कैलाशपुरी, तुर्कातिसौर, खैराना, बिज्टी व मटिहा गांवों के लिए 12 करोड़ रुपये की लागत से पीचिंग का कार्य किया जा रहा है। इनमें 1.45 करोड़ के काम पूर्ण हो चुके हैं। लेकिन विभाग द्वारा नदियों की सिल्ट हटाने व गहराई के लिए कोई इस्टीमेट तैयार नहीं किया गया। इस बार मानसून के दस्तक देते ही पहाड़ी व तराई क्षेत्र में मूसलाधार बारिश होने लगी है। कुमाऊं व गढ़वाल में दो दिन की बारिश से आपदा कहर बनकर टूटने से यहां के लोग भी सहम उठे हैं। किसान नदियों की संभावित बाढ़ को लेकर चिंतित हैं।

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