
हरिद्वार। भगवान केदारनाथ की पूजा पर विवाद तो हुआ ही है, धर्मगुरु और विद्वान भी बंट गए हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती बेवजह भ्रम फैला रहे हैं। इसके विपरीत संन्यास परंपरा से जुड़े साधु-संत जगद्गुरु को सही ठहरा रहे हैं।
जहां तक पूजा का सवाल है, मंदिरों के जीर्णोद्धार अथवा खंडित होने पर देवों की पूजा उन्हें अन्यत्र रख कर की जाती रही है। वर्ष 1934-35 में हरकी पैड़ी स्थित चार मंदिरों का नव निर्माण कराया गया था। तब मंदिरों की प्रतिमाओं को गंगा में तख्त रख स्थापित किया था और वहीं पूजा अर्चना की थी। आतंकवादियों ने जब अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर को क्षतिग्रस्त किया तब पूजा-अर्चना अन्य स्थान पर की थी। वैसे भी घरों में किसी की मौत पर जब पातक अथवा अशौच हो जाता है तब घरों के ठाकुर जी को किसी पड़ोसी के घर 13 दिनों की पूजा के लिए भेज दिया जाता है। देश के कुछ अन्य मंदिरों के जीर्णोद्धार के समय भी अन्यत्र पूजा हुई है। गुजरात में सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर का भव्य निर्माण कराया था, तब मंदिर की पूजा पड़ोस के एक मंदिर में की गई थी। देश के कईं मंदिरों में भी ऐसा होता आया है।
इसके विपरीत जगद्गुरु शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का मानना है कि ज्योर्तिलिंगों और शक्तिपीठों की पूजा उसी स्थल पर हो सकती है, जहां वे विद्यमान हैं। पूजा को लेकर हरिद्वार ही नहीं देश के संत और पंडित विभाजित हैं।
पूजा हटाने में कोई हर्ज नहीं
शंकराचार्य का विरोध जायज नहीं। जब आपातकाल आ गया है और मंदिर का अस्तित्व संकट में फंस गया है, तब पूजा हटाने में क्या हर्ज है। आखिर घरों में भी तो लोग पातक होने पर अपने ठाकुर जी दूसरों के घरों में भेज देते हैं। वास्तव में केदारनाथ जैसे पवित्र धामों को पिकनिक स्पॉट बनाने से बचाना होगा। जब तक ऐसा नहीं होगा हादसे होते रहेंगे। पूजा ऊखीमठ में होने का संत जगत में कोई विरोध नहीं है।
-महामंडलेश्वर शांतानंद शास्त्री, जगदीश आश्रम
नहीं हो सकती अन्यत्र पूजा
केदारनाथ स्थापित नहीं है। वे स्वयंभू है और स्वत: प्रकट है। उनकी पूजा केवल केदारनाथ में हो सकती है। भगवान केदारनाथ का अपमान करने का अधिकार रावल को नहीं है। दुर्भाग्य का विषय है कि रावल अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए ऊखीमठ में पूजा करा रहे हैं। देश के धर्मज्ञ ऐसा नहीं होने देंगे।
-पंडित नितिन शुक्ला, अध्यक्ष धर्मजागृति संघ
जिसने बचाया, उस पत्थर को पूजें
भगवान केदारनाथ के मंदिर को उस विशाल पत्थर ने बचाया है जिसके कारण बाढ़ का पानी दो भागों में विभाजित हो गया था। यदि पूजना है तो उस पत्थर की पूजा शिवलिंग की भांति होनी चाहिए। वह पत्थर साक्षात भगवान शिव ने भेजा है। केदारनाथ मंदिर में लाशें भरी हैं, ऐसे मेें भला कैसे पूजा की जा सकती है। अनेक तीर्थ स्थलों पर मंदिरों के खंडित होने पर अन्यत्र पूजा की जाती है। शंकराचार्य का विरोध गैरजरूरी है।
-पंडित कमलकांत, मुख्य पुजारी, गंगा मंदिर हरकी पैड़ी
