केदारनाथ में पहली बार नहीं लगा भतूज मेला

रुद्रप्रयाग। केदारनाथ में सदियों पुरानी परंपरा इस साल टूट गई। ऐसा पहली बार हुआ है जब भगवान आशुतोष के 11वें ज्योर्तिलिंग केदारनाथ में भतूज (अन्नकूट) मेला नहीं लगा। यहां भगवान तो हैं, लेकिन ताले में कैद हैं। मंदिर के दरवाजे पर लगे ताले के कारण कोई भी भगवान शिव के स्वयंभू लिंग का श्रृंगार करने अंदर नहीं जा सकता।
16/17 जून को आए केदारनाथ जलप्रलय ने सदियों से चली आ रही परंपराओं में व्यवधान पैदा कर दिया है। मार्ग ध्वस्त होने से शिव भक्त केदारनाथ धाम नहीं पहुंच पा रहे हैं, जो लोग चोरी-छिपे पहुंच भी रहे हैं, वह बाबा केदार के दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। श्री बदरीनाथ-मंदिर समिति ने मंदिर के गर्भगृह और परिसर की सफाई करने के बाद मंदिर के दरवाजों पर ताले लगा दिए हैं। अब भतूज मेले में भी भगवान अकेले रहेंगे। भतूज मेला रक्षा बंधन के पूर्व रात्रि को लगता है। इसमें शिवलिंग को पके चावलों (भात) से अलंकृत कर ढक दिया जाता है। भात के एक-एक दाने की शिवलिंग के चारों ओर लाइन लगाई जाती है।
बाबा का श्रृंगार रात नौ बजे केदारनाथ मंदिर में आरती के बाद शुरू होता था, जो रात एक बजे तक चलता। रात एक बजे से सुबह के चार बजे तक मंदिर के कपाट खोलकर भक्तों को अलंकृत शिवलिंग के दर्शन कराए जाते थे। वर्ष में यही अवसर है, जब रात को मंदिरों के कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाते हैं, लेकिन इस साल ऐसा देखने को नहीं मिला।

मान्यता
जब भगवान शिव ने विश्व के कल्याण के लिए हलाहल विष का पान किया था, तो इस विष अग्नि को शांत करने के लिए विभिन्न वन औषधियों और अन्न रस का उन्होंने सेवन किया था। प्रतीक रुप में भात को शिवलिंग के चारों ओर लगाया जाता है। भगवान को अर्पित पके चावलों को प्रसाद रूप में वितरित नहीं किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि केदारघाटी की अविवाहित लड़कियां विवाह होने से पूर्व एक बार शिव के इस रूप का दर्शन करने अनिवार्य रूप से केदार जाती हैं।

सरकार और समिति दोषी
केदारनाथ भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में से एकमात्र स्थान हैं, जहां भतूज मेला लगता है। यह पहला अवसर है जब भतूज मेला नहीं हुआ। इसके लिए सरकार और मंदिर समिति दोषी हैं। यदि ताला नहीं लगा होता, तो हम बाबा केदार की पूजा कर पाते। – माधव कर्नाटकी, संगठन सचिव, केदारसभा।

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