
शिमला। हिमाचल सरकार मशरूम उद्योग को नई संजीवनी देने जा रही है। इसके लिए मशरूम को कृषि उत्पाद कैटेगिरी में लाया जा रहा है। वर्तमान में मशरूम एग्रीकल्चर प्रोडयूस एंड मार्केटिंग एक्ट के तहत नहीं आता। इस कारण इसे उगाना कृषि गतिविधि नहीं मानी जाती। मशरूम की खेती बंद कमरों में तापमान बनाए रखने के कारण होती है। तापमान का स्तर बनाए रखने के लिए बिजली की जरूरत पड़ती है। लेकिन कृषि गतिविधि न होने के कारण इसके लिए कमर्शियल रेट किसानों को चुकाने पड़ रहे हैं।
यदि इस खेती को एग्रीकल्चर प्रोडयूस के दायरे में लाया जाए तो बिजली भी कृषि टैरिफ पर मिलेगी। इन दोनों टैरिफ में भारी अंतर है। कमर्शियल रेट बिजली का 4.50 से 5.00 रुपये प्रति यूनिट है, जबकि कृषि कार्यों पर लगने वाला टैरिफ महज 50 पैसे प्रति यूनिट है। इस बारे में किसानों ने मसला सरकार के सामने उठाया था। वर्तमान में मशरूम का सबसे ज्यादा उत्पादन सोलन जिला में होता है। अन्य क्षेत्रों तक यह इसलिए नहीं बढ़ पाया क्योंकि बिजली महंगी होती जा रही है। इसलिए रेट गिरने से इस खेती का विस्तार भी होगा।
अतिरिक्त मुख्य सचिव कृषि दीपक सानन ने बताया कि मुख्यमंत्री ने मशरूम को कृषि उत्पाद कैटेगिरी में लाने का वादा किया है। इसी अनुसार विभाग इस बारे में अधिसूचना ला रहा है। अगले सप्ताह में यह जारी हो जाएगी। वर्तमान में गुच्छी की खेती तो कृषि उत्पादों की श्रेणी में है, लेकिन मशरूम नहीं। अधिसूचना के बाद लोगों को राहत मिलेगी।
