कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण में जुटे शिक्षक कैलाश लोहनी

चंपावत। कुमाऊंनी भाषा को नए तेवर और खास पहचान देने वाले साहित्यसेवियों में शामिल शिक्षक कैलाश चंद्र लोहनी कुमाऊंनी भाषा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। शिक्षक दिवस पर उनकी साहित्य सेवा के जज्बे को सलाम है। उन्होंने महाकवि कालीदास की रचना अभिज्ञान शांकुतलम का कुमाऊंनी भाषा रूपांतर भी शंकुतलाकि पछाण के रूप में किया है। जिस पर उन्हें 1994 में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से सम्मानित किया जा चुका है। संस्कृत भाषा के साहित्य को कुमाऊंनी भाषा में अनुवादित और परिवर्तित करने के लिए शिक्षक लोहनी ने जैसे कोई मुहिम सी छेड़ रखी है। या यूं कहा जाए कि संस्कृत साहित्य को कुमाऊंनी भाषा में बदलने का उन पर जुनूस सा सवार है।
20 अप्रैल 1942 को अल्मोड़ा जिले के सतराली में जन्मे कैलाश लोहनी शिक्षा विभाग में प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी कुमाऊंनी साहित्य की सेवा और उसके संरक्षण के कार्य में जुटे हैं। कुमाऊं के आदि कवि गुमानी के दुर्लभ साहित्य गुमानी ग्रंथावली के संपादन के साथ ही उन्होंने सतराली दर्शन पत्रिका का संपादन भी किया है। इसके अलावा उन्होंने कर्णभाट और दूतवाक्य जैसी रचनाओं का भी कुमाऊंनी भाषा में अनुवाद किया है। उन्होंने महाकवि भास कृत अभिषेक नाटक, बाल चरित्र, प्रतिमा नाटक, प्रतिज्ञा यौगंधरायण, स्वपभनवासदत्ता, चारूदत्त, शुद्रक कृत मृच्छकटिकम, विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस, भवभूति की उत्तर रामचरित का भी कुमाऊंनी भाषा में अनुवाद किया है।
कुमाऊंनी भाषा और साहित्य से संबंधित शोध लेख परिषद पत्रिका, भाषा, जनभारती, सप्तसिंधु, उत्तराखंड भारती, युवक, पुरवासी, उत्तर प्रदेश योजना आदि शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। उन्होंने विभिन्न साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं के सिर्फ कुमाऊंनी भाषा में अनुवाद ही नहीं किया है। बल्कि कुमाऊंनी भाषा का शास्त्रीय अध्ययन, कुर्मांचली-हिंदी शब्दकोष और उत्तराखंड की परंपरागत चिकित्सा और जड़ी बूटी विषय पर भी कुमाऊंनी में कई पुस्तकें लिखने का कार्य किया है।

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