कमेटी व्यवस्था का सच सामने लेकर आया ‘कमेटी’

श्रीनगर। देश में केंद्र तथा राज्यों की शासन सत्ता से आम आदमी की मांगों को दबाने के लिए किस तरह कमेटियां गठित की जाती हैं, इसका सच सामने लाने में ‘कमेटी’ नाटक सफल रहा। यूथ क्लब के प्रयास से बच्चों की ओर से मंचित किया गया ‘कमेटी’ नाटक दर्शकों को खूब पसंद आया। नाटक में 10 से 14 आयु वर्ग के बच्चों ने प्रतिभाग किया।
गढ़वाल विवि के स्वामी मंमथन प्रेक्षागृह में मंगलवार देर शाम हुए कमेटी नाटक में तीन अलग-अलग दृश्य दिखाए गए। नाटक ‘कमेटी’ के पहले दृश्य से लेकर अंतिम दृश्य में बालमन के विविध पक्षों और जिज्ञासाओं को बखूबी प्रदर्शित किया गया। नाटक भ्रष्टाचार, वन कटान, जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के परिणामों तथा इनके विरोध में उठती आवाजों को कमेटियों के माध्यम से दबाने की परंपरा को दर्शाने में सफल रहा। नाटक में गंभीर मुद्दों के साथ ही हास्य और विनोद का पुट भी दिया गया। नाटक को यूथ क्लब के सचिव दीपक बिष्ट ने लिखा और निर्देशित किया। अक्षांश उनियाल, सौम्य चमोली, कौस्तूभ रावत, अनुराग घिल्डियाल आदि बच्चों के अभिनय के दर्शक कायल हो गए। संगीत अमित सागर, सहायक निर्देशन मनीष चमोली, ऋषि पटवाल, मनोज सुंदरियाल ने किया। मंच उमंग कुकसाल और पूनम गुर्साइं ने तैयार किया।

नाटक का कथानक:
नाटक का पहला दृश्य जंगल से शुरू होता है। जिसमें पेड़ों के कटान से पशु-पक्षियों को होने वाली परेशानी को दर्शाया गया है। बढ़ते मानवीय दखल से परेशान जंगली जानवर एक दिन एक नेता के समक्ष अपनी परेशानी रखते हैं और नेताजी कमेटी के गठन का आश्वासन दे अपने पक्ष में नारे लगवाकर लौट आते हैं। दूसरे दृश्य में गांवों में बढ़ते भ्रष्टाचार के लिए गांवपाल की जरूरत महसूस होती है। गांवपाल के लिए हल्ला मचाओ रे तथा बाबा योगदेव के नेतृत्व में आंदोलन होते हैं, लेकिन ये आंदोलन भी कमेटी के गठन में ही उलझकर रह जाता है। तीसरे दृश्य में कमेटियों की समीक्षा होती है और पता लगता है कि कमेटियों के सदस्य अपने मानदेय बढ़ाने के लिए ही 50 से अधिक बैठकें कर चुके होते हैं, लेकिन असल मुद्दे का कोई हल नहीं निकाला जा सका है।

प्रमुख संवाद:
– वो इंसानों की नहीं सुनते, जानवरों की क्या खाक सुनेंगे।
– जब तक गांवपाल पास नहीं होता, मैं आंदोलन करता रहूंगा।

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