
कांडा। कांडा पड़ाव में आईटीआई भवन को लोगों ने पसीना बहाकर और एक-एक पाई जुटाकर तैयार किया था। यह भवन गुजरे वक्त में लोगों के पारस्परिक सहयोग के साथ ही शिक्षा के प्रति जागरूकता का प्रतीक है। उपयोग में नहीं होने के कारण अब यह धरोहर बरबाद हो रही है। आज कोई भी इसका सुधलेवा नहीं है।
1944 में कांडा पड़ाव में हाईस्कूल की कक्षाओं के साथ लोगों ने विद्यालय का संचालन किया। श्रमदान और पारस्परिक सहयोग से लगभग सात नाली भूमि पर दस कमरे और एक बड़ा हाल बनाया। बाद में अन्य कमरे बनते रहे। इस भवन में कुल 28 कमरे हैं। 1953 में इस संस्था से हाईस्कूल पास कर चुके कौसानी जीआईसी के पूर्व प्रधानाचार्य हरीदत्त भट्ट ने बताया कि 1952 में यहां इंटर कला और 1967 में इंटर विज्ञान की मान्यता मिली। 1977 में इस अशासकीय मान्यता प्राप्त संस्था का प्रांतीयकरण हो गया और यह संस्था पूरी तरह सरकार के पास चली गई। बाद में इंटर कालेज का एक नया भवन बनने पर यह पुराना भवन आईटीआई को बेच दिया गया। कुछ साल पहले आईटीआई का भी नया भवन बन गया। तभी से यह प्राचीन भवन खाली है। इसकी देखरेख का कोई इंतजाम नहीं है। टिन और पत्थर चोरी होने लगे हैं। यहां अराजक तत्वों को अड्डा बना हुआ है। कुछ साल पहले यहां एक युवक ने खुदकुशी कर ली थी। ग्रामीणों ने इस भवन की मरम्मत करके जीजीआईसी को सौंपने संबंधी प्रस्ताव शासन को भेजा है लेकिन अभी कोई जवाब नहीं मिला है।
