
बिलासपुर। आखिर वही हुआ, जिसकी संभावना पिछले काफी समय से जताई जा रही थी। सरकार ने ओहदा तो दे दिया, लेकिन काम करने की आजादी नहीं दी। हाईकमान के समक्ष भी बात रखी गई, लेकिन स्थिति जस की तस रही। यही वजह रही कि घुमारवीं के विधायक राजेश धर्माणी को सीपीएस पद से इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा। कांग्रेस के इस युवा तुर्क के ‘धमाके’ से जिले की सियासत गरमा गई है।
कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले घुमारवीं के युवा विधायक राजेश धर्माणी ने लगातार दूसरी बार विधानसभा की दहलीज लांघी है। अलबत्ता, मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के साथ उनके संबंध अधिक मधुर नहीं रहे हैं। अब इसे सरकार की ‘मजबूरी’ कहा जाए या कुछ और, लेकिन कांग्रेस के सत्ता में आने पर जिले में वरिष्ठता के आधार पर उन्हें सीपीएस के पद से नवाजा गया। उन्हें ओहदा तो दे दिया गया, लेकिन फ्री हैंड नहीं रहे। सूत्रों के अनुसार न तो उन्हें कोई काम सौंपा गया और न ही उनके काम हो पा रहे थे। वीरभद्र खेमे के नेताओं को अधिक तवज्जो देने से पूरी हो गई। उन्हाेंने हाईकमान के समक्ष भी अपनी स्थिति बयान की थी। कोई फायदा नहीं हुआ।
सीपीएस पद से इस्तीफे की वजह जो भी हो, लेकिन अपेक्षाकृत शांत स्वभाव के धर्माणी के इस ‘धमाके’ से जिले की सियासत गरमा गई है। राजेश धर्माणी ने कहा कि उन्हाेंने काफी प्रयास किए कि उन्हें सीपीएस के पद के अनुरूप काम मिले, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। ऐसे में इस पद पर बने रहना केवल उनके व्यक्तिगत फायदे तक ही सीमित था। विस क्षेत्र और जनता को इसका कोई फायदा नहीं मिल रहा था। इसके चलते उन्होंने पद छोड़ना उचित समझा है।
