
नूरपुर (कांगड़ा)। सोना उगलने वाली कांगड़ा जनपद की हलदून घाटी के हजारों विस्थापितों को राजस्थान में बसाने की कवायद में बीते चार दशकों में किसको क्या मिला है, यह किसी से भी छिपा नहीं। प्रदेश की सबसे बड़ी मानव निर्मित पौंग झील घाटी के 16 हजार 352 विस्थापितों परिवारों के दर्द व आंसुओं से सींचकर तैयार की गई थी। इससे बनने वाली बिजली व पौंग के पानी से पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में खुशहाली ने दस्तक दी है। वहीं, देश हित में अपना सर्वस्व लुटाने वाले हिमाचलियों के हिस्से सिर्फ तबाही और मछलियां ही आई हैं।
इस मर्तबा भी पौंग बांध से रोजाना ब्यास दरिया में छोड़े जा रहे पानी ने मंड क्षेत्र के लोगों को फिर से बर्बादी की कगार पर खड़ा कर दिया है। 1973 में पौंग बांध में पानी भरने के बाद से मंड क्षेत्र के लोग हर साल उजड़ने के डर में जिंदगी जीने को मजबूर हैं। पौंग का पानी ब्यास दरिया में अपनी दिशा बदलकर कइयों को विस्थापित कर देता है, लेकिन हर बार चुनावों में विस्थापितों के जख्मों पर मरहम लगाने के सियासतदानों के बड़े-बड़े दावे भी पौंग बांध से निकलकर ब्यास दरिया में बहते नजर आते हैं। पौंग के पानी की चपेट में आए प्रभावितों परिवारों नीलम कुमारी, लाल चंद, बशीर मोहम्मद, रोशन लाल, अजीत कुमार इत्यादि ने बताया कि न तो सामान बाहर निकाल सकते हैं और न ही घर को छोड़कर जा सकते हैं।
जिप उपाध्यक्ष जगदेव सिंह, रियाली पंचायत के प्रधान सतपाल, टटवाली के प्रधान प्रेम चंद का कहना है कि कई बार सरकारी नुमाइंदों से ब्यास दरिया को चैनेलाइज करने की मांग की है, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हो पाया है। इसका कोई स्थायी हल निकालने की बजाय उल्टा हर साल करोड़ों की तबाही के एवज में लाखों रुपये का मुआवजा देकर हाथ खड़े कर दिए जाते हैं।
