
हल्द्वानी। भारत गांवों का देश है सिर्फ इसलिए नहीं कहा जाता कि यहां बेशुमार गांव हैं। इसे गांवों का देश इसलिए कहते हैं, क्योंकि यहां मालशी जैसे गांव हैं। रुद्रपुर के मालशी गांव के लोग मजदूरी करते हैं, खेतों में बंटाई करते हैं, भीख तक मांगते हैं। इतने कठिन जीवन के बावजूद जरूरत पर एक-दूसरे के काम आते हैं, जबकि शहरों का तो यह हाल है कि पड़ोसी बीमार था तब पता चलता है जब उसकी शवयात्रा निकलती है।
गांव के तेजपाल की तीमारदारी में इन दिनों मालशी के लोग हल्द्वानी में डेरा जमाए हैं। गांव से लोग रोज आते हैं, जाते हैं, लेकिन कम से कम 25-30 ग्रामीण तेजपाल की देखरेख के लिए हल्द्वानी में ही रहते हैं। चाहें तो रोज घर से आ-जा सकते हैं, लेकिन तेजपाल के माता-पिता को रात में अकेला छोड़कर कोई नहीं जाना चाहता। इस वजह से रात में सड़क किनारे ही सो जाते हैं। इस तरह रात तो एसटीएच के बगल में दवाओं की दुकान के आगे कटती है। सुबह दुकानें खुलने पर यह लोग इसके बगल में खाली प्लाट में शिफ्ट हो जाते हैं।
इसके बाद यहीं चूल्हा लगता है और आने-जाने का सिलसिला भी शुरू होता है। करीब 20 लोग रोज गांव लौटते हैं तो 20 नए तेजपाल की तीमारदारी के लिए हल्द्वानी आते हैं। गांव से आने वाले लोग राशन लाते हैं और इससे ही दिन का भोजन तैयार होता है। खाली प्लाट में दिनभर जलता सूरज ठंडा होता है। शाम होती है, रात होती है, दुकानें बंद होती हैं और शहर सो जाता है। लेकिन, गांव के यह लोग जगे रहते हैं इस उम्मीद में कि अगली सुबह वह तेजपाल को लेकर लौट जाएंगे गांव की तरफ, क्योंकि शहर के लोग उन्हें नहीं पहचानते।
