मारे गए सैनिकों को न्याय दिलाने में कोरोना बना बाधक, पीयू का शोध रुका

मारे गए सैनिकों को न्याय दिलाने में कोरोना बना बाधक, पीयू का शोध रुका

चंडीगढ़
1857 की क्रांति में मारे गए सैनिकों को न्याय दिलाने के लिए चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में चल रहा शोध कोरोना के चलते थम गया है। शोध के तहत सैनिकों की हड्डियों व दांतों के अवशेष जांच को विदेश भेजे गए थे, जिनकी रिपोर्ट करीब डेढ़ साल से नहीं आ सकी है। ऐसे में शोध पर संकट के बादल छा गए हैं। इस प्रोजेक्ट से जुड़े वैज्ञानिक चिंता में हैं, क्योंकि वह समय पर शोध पूरा करना चाहते हैं। हालांकि केंद्र सरकार ऐसे प्रोजेक्ट की समय सीमा बढ़ाने की तैयारी में है। 

वर्ष 2014 में अमृतसर के अजनाला में एक कुएं से बड़ी मात्रा में मानव हड्डियां व दांत बरामद हुए थे। इस कुएं की खुदाई ब्रिटिश कमिश्नर हेनरी कूपर की किताब के आधार पर हुई थी। उन्होंने अपनी किताब में लिखा था कि भारत को स्वतंत्र कराने की इच्छा रखने वाले 282 सैनिकों ने ब्रिटिश सेना से दगाबाजी की। उन सभी को अजनाला में पकड़ा गया और मौत के घाट उतार दिया गया। सभी के शव वहीं के एक कुएं में डाल दिए गए। 

छह साल से चल रहा है शोध
अजनाला में खुदाई के दौरान बरामद इन सैनिकों के अवशेषों पर शोध शुरू हुआ ताकि मृत सैनिकों की पहचान हो सके और उन्हें न्याय दिलाया जा सके। इसका जिम्मा पीयू के डॉ. जेएस सहरावत के पास आया। वह छह साल से इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। कई शोधार्थी भी इस पर काम कर रहे हैं। शोध प्रस्ताव अंतिम चरण में है लेकिन पूरा नहीं हो पा रहा, कोरोना ने बाधा डाल दी है। इस शोध के परिणाम पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। 

जर्मनी, हंगरी और कैलिफोर्निया भेजे गए हैं नमूने
जनवरी 2020 में जर्मनी की एक प्रयोगशाला को सैनिकों की हड्डियों व दांतों के नमूने जांच के लिए भेजे गए थे। इनके जरिए 200 साल पुराने डीएनए का पता लगाया जाना था। दूसरे नमूने फरवरी 2020 में हंगरी भेजे गए। यहां की प्रयोगशाला से रेडियो कार्बन डेटिंग जांच करवाई जानी थी। इसके जरिए यह पता लगता कि सैनिकों की मौत का समय क्या था। तीसरी जांच रेडियो आइसोटोप की थी। इसके लिए नमूने कैलिफोर्निया की प्रयोगशाला को भेजे गए। इस जांच के जरिए यह पता लगता कि यह सैनिक किन-किन इलाकों में रहे हैं, वह क्या-क्या खाते थे। साथ ही और भी कई चीजों का पता चलता लेकिन कोरोना के चलते अब तक इनकी रिपोर्ट नहीं मिल पाई है जबकि 10 से 15 लाख रुपये एडवांस में दिए भी जा चुके है। कई बार प्रयोगशालाओं के संचालकों को पत्र लिखे गए। वहां कोरोना गाइड लाइन का पालन किया जा रहा है। स्टाफ कम बुलाया जा रहा है। ऐसे में वहां अपने देश के नमूनों की पहले जांच की जा रही है। 
तीन-चार देशों की प्रयोगशालाओं में जांच के नमूने भेजे गए हैं। एक साल से अधिक समय हो गया है, लेकिन रिपोर्ट नहीं मिली है। कोरोना के कारण कई चीजों पर विदेश में प्रतिबंध लगा है। जैसे ही रिपोर्ट मिलेगी, शोध को आगे बढ़ाया जाएगा।-डॉ. जेएस सहरावत, प्रधान वैज्ञानिक, पीयू 

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