ग्लेशियरों को नहीं मिला सुरक्षा कवच, विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी

ग्लेशियरों को नहीं मिला सुरक्षा कवच, विशेषज्ञों की चिंता बढ़ी

कुल्लू
समुद्रतल से 13050 फीट ऊंचे रोहतांग दर्रा में पहली बार बर्फबारी में रिकॉर्ड कमी आंकी गई है। 25 से 30 फीट बर्फ की मोटी चादर से लकदक रहने वाले रोहतांग में इस बार मात्र 8 से 10 फीट बर्फ है। मनाली-लेह मार्ग पर बारालाचा, शिंकुला दर्रा में भी अपेक्षा से बहुत कम हिमपात हुआ है। मौसम के बदले चक्र से पर्यावरण और ग्लेशियर विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। 

हिमालय रेंज में करीब 9500 छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं। पिछले दो दशकों से ये ग्लेशियर लगातार पिघलकर सिकुड़ रहे हैं। इस सीजन में बर्फ के फाहे कम गिरने से ग्लेशियरों का दायरा नहीं बढ़ पाया है। इसका असर न केवल पर्यावरण संतुलन पर पड़ेगा बल्कि नदी-नालों के जलस्तर के साथ जल स्रोतों पर भी पड़ेगा। सर्दी में कम बर्फबारी के बाद अब ग्लेशियर वैज्ञानिकों की नजर गर्मी के मौसम पर टिकी है। 

केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला में बतौर पर्यावरण विज्ञान और ग्लेशियर के जानकार असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनुराग ने कहा कि हिमालय रेंज में कम बर्फबारी होने से ग्लेशियरों का दायरा नहीं बढ़ना घातक है। उन्होंने कहा कि अगर सर्दी में बर्फबारी कम हो रही है और गर्मी में ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं तो इसको रिकवर करने में चार से पांच साल का समय लगेगा। उधर, सीमा सड़क संगठन के कमांडर उमाशंकर ने कहा कि इस बार रोहतांग दर्रा में बर्फबारी कम हुई है। 

सोलंगनाला में बर्फबारी नहीं हुई है। 8 से 10 फीट बर्फ से लकदक रहने वाले कोठी और सिस्सू में इस बार मुश्किल से 25 सेेंटीमीटर बर्फ ही जमी है। रोहतांग दर्रा में भी 7 से 8 फीट बर्फ है। पहले रोहतांग में 25 से 30 फीट बर्फ रिकॉर्ड की जाती थी। – कर्नल नीरज राणा, पर्वतारोहण संस्थान मनाली के उपनिदेेशक 

कहां कितने ग्लेशियर 
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के ताजा सर्वे के मुताबिक हिमालय रेंज में कुल 9500 छोटे-बड़े ग्लेशियर हैं। चिनाब बेसिन में 989, रावी बेसिन में 94, सतलुज बेसिन में 258 और ब्यास बेसिन में 144 ग्लेशियर हैं। 

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